गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया — मीर तक़ी मीर

गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया रातों को रोते रोते ही जों शम-ए-गुल गया

“From the heat, I melted in the flame of sorrow, By crying through the nights, I turned to the lamp of roses.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया, और रातों को रोते-रोते ही मैं शम-ए-गुल बन गया।

विस्तार

यह शेर ग़म के बहुत गहरे एहसास को बयां करता है। शायर कह रहे हैं कि वो तो सिर्फ़ गर्मी से नहीं, बल्कि अपने ग़म की आग से पिघल गए। यह कैसा ग़म है कि रात भर रोने से, गुलाब की वो शमा भी बुझ गई। यह एक ऐसी विरह की स्थिति है, जहाँ दुख न केवल जलाता है, बल्कि पूरी रौशनी छीन लेता है।

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