ग़ज़ल

बज़्म में जो तिरा ज़ुहूर नहीं

बज़्म में जो तिरा ज़ुहूर नहीं

यह ग़ज़ल उस महफ़िल (बज़्म) की बात करती है जहाँ महबूब का दीदार नहीं है। शायर कहता है कि चूँकि महबूब का नूर मौजूद नहीं है, इसलिए यहाँ की रौनक फीकी है। वह यह भी कहता है कि वह अपनी बेबसी या यादों के झूठे सहारे पर जीना नहीं चाहता, बल्कि उस दर्द को स्वीकार करना चाहता है जिसमें एक अजीब सी राहत है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
बज़्म में जो तिरा ज़ुहूर नहीं शम-ए-रौशन के मुँह पे नूर नहीं
जमावड़े में तुम्हारा न दिखना, रोशन दीपक के मुख पर उजाला नहीं है।
2
कितनी बातें बना के लाऊँ एक याद रहती तिरे हुज़ूर नहीं
अर्थ यह है कि मैं आपके लिए कितनी भी बातें सजाकर लाऊं, लेकिन मुझे केवल आपकी उपस्थिति की याद आती है।
3
ख़ूब पहचानता हूँ तेरे तईं इतना भी तो मैं बे-शुऊर नहीं
मैं तुम्हारे इरादे बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। मैं इतना भी अनजान नहीं हूँ।
4
क़त्ल ही कर कि उस में राहत है लाज़िम उस काम में मुरूर नहीं
उसे मार दो, क्योंकि उसमें राहत है; उस काम में भटकना ज़रूरी नहीं है।
5
फ़िक्र मत कर हमारे जीने का तेरे नज़दीक कुछ ये दूर नहीं
अर्थ यह है कि मेरे जीवन के बारे में चिंता मत करो, क्योंकि तुम्हारे पास कुछ भी दूर नहीं है।
6
फिर जिएँगे जो तुझ सा है जाँ-बख़्श ऐसा जीना हमें ज़रूर नहीं
फिर जिएँगे जो तुझ सा है जाँ-बख़्श, ऐसा जीना हमें ज़रूर नहीं। इसका शाब्दिक अर्थ है कि जो जाँ-बख़्श (जीवनदाता) तुझ सा है, हम वैसा जीवन जी नहीं पाएँगे।
7
आम है यार की तजल्ली 'मीर' ख़ास मूसा व कोह-ए-तूर नहीं
मीर कहते हैं कि मेरे यार की तजल्ली आम है, वह न तो मूसा हैं और न ही कोह-ए-तूर।
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