ग़ज़ल

मिसाल-ए-साया मोहब्बत में जाल अपना हूँ

मिसाल-ए-साया मोहब्बत में जाल अपना हूँ

यह ग़ज़ल प्रेम के रंग में खुद को एक जाल या बंधन के समान बताती है। शायर कहता है कि वह अपने प्रियजन के साथ हर स्थिति में बंधा हुआ है, और उसका वियोग की प्यास निरंतर बनी रहती है। वह स्वयं को प्रेम के नशा और हर चीज़ का सार बताता है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
मिसाल-ए-साया मोहब्बत में जाल अपना हूँ तुम्हारे साथ गिरफ़्तार-ए-हाल अपना हूँ
छाया की मिसाल की तरह, मैं मोहब्बत में जाल में फँसा हूँ; तुम्हारे साथ अपनी ही हालत में गिरफ्तार हूँ।
2
सरिश्क-ए-सुर्ख़ को जाता हूँ जो पिए हर-दम लहू का प्यासा अलल-इत्तिसाल अपना हूँ
जो हरदम सुर्ख़ (लाल) रंग का पेय पीता है, वह मैं हूँ। मैं निरंतर जुड़ाव के रक्त का अपना हूँ।
3
अगरचे नश्शा हूँ सब में ख़ुम-ए-जहाँ में लेक ब-रंग-ए-मय अरक़-ए-इंफ़िआ'ल अपना हूँ
हालांकि मैं दुनिया के नशे में हूँ, पर मैं अपने जुनून की शराब में अपना हूँ।
4
मिरी नुमूद ने मुझ को किया बराबर ख़ाक मैं नक़्श-ए-पा की तरह पाएमाल अपना हूँ
मेरी नुमूद ने मुझ को बराबर ख़ाक कर दिया, पर मैं रेत पर पड़े निशान की तरह खोया हुआ हूँ।
5
हुई है ज़िंदगी दुश्वार मुश्किल आसाँ कर फिरूँ चलूँ तो हूँ पर मैं वबाल अपना हूँ
ज़िंदगी बहुत कठिन और मुश्किल हो गई है, उसे आसान कैसे करें; मैं अपने भाग्य का मालिक हूँ, जहाँ भी मैं घूमता हूँ।
6
तिरा है वहम कि ये ना-तवाँ है जामे में वगर्ना मैं नहीं अब इक ख़याल अपना हूँ
तेरा वहम कि ये ना-तवाँ है जामे में, वरना मैं नहीं अब इक ख़याल अपना हूँ।
7
बला हुई है मिरी गो का तब्-ए-रौशन 'मीर' हूँ आफ़्ताब व-लेकिन ज़वाल अपना हूँ
हे मेरे दिल, ऐ चमकीली आभा, तुम कमजोर पड़ गई हो, ऐ मीर; मैं सूरज हूँ, फिर भी मैं अस्त हो रहा हूँ।
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