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ग़ज़ल

गर कुछ हो दर्द आईना यूँ चर्ख़-ए-ज़िश्त में

गर कुछ हो दर्द आईना यूँ चर्ख़-ए-ज़िश्त में

यह ग़ज़ल दर्द और इश्क़ के आईने के रूप में जीवन की नश्वरता और विरह की पीड़ा को दर्शाती है। शायर कहते हैं कि प्रेम की अग्नि में सब कुछ राख और धूल हो जाएगा, और यह दिल का बेचैनपन (सोख़्ता-दिल) स्वर्ग में भी कष्ट देगा। अंत में, शायर अपनी आवारगी को स्वीकार करते हुए कहता है कि वह कब तक इस तरह का संघर्ष करता रहेगा, और वह अपने दिल को लेकर बैठ जाएगा।

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1
गर कुछ हो दर्द आईना यूँ चर्ख़-ए-ज़िश्त में इन सूरतों को सिर्फ़ करे ख़ाक-ओ-ख़िश्त में
अगर कोई दर्दनाक बात हो, तो जीवन के इस चक्के (चक्र) के आईने में, ये चेहरे केवल धूल और राख बन जाएंगे।
2
रखता है सोज़-ए-इश्क़ से दोज़ख़ में रोज़-ओ-शब ले जाएगा ये सोख़्ता-दिल क्या बहिश्त में
प्रेम की जलन से यह व्यक्ति मुझे दिन-रात नर्क में रखता है, क्या यह जलता हुआ दिल मुझे स्वर्ग ले जाएगा।
3
आसूदा क्यूँके हूँ मैं कि मानिंद-ए-गर्द-बाद आवारगी तमाम है मेरी सरिश्त में
मैं किसलिए भोला हूँ, जैसे एक उड़ता हुआ पक्षी, क्योंकि मेरा पूरा अस्तित्व ही एक भटकन है।
4
कब तक ख़राब सई-ए-तवाफ़-ए-हरम रहूँ दिल को उठा के बैठ रहूँगा कुनिश्त में
मैं कब तक ख़राब सई-ए-तवाफ़-ए-हरम (काबा के चारों ओर की खराब परिक्रमा करने वाली) रहूँ और दिल को कुनिश्त (असुविधाजनक जगह) में बैठा रहूँ।
5
मातम के हूँ ज़मीन पे ख़िर्मन तो क्या अजब होता है नील चर्ख़ की उस सब्ज़ किश्त में
धरती पर मेरा शोक और मातम, तो ख़िर्मन क्या अजब होता है, उस हरी सवारी में नीले चक्र की।
6
सरमस्त हम हैं आँखों के देखे से यार की कब ये नशा है दुख़्तर-ए-रज़ तुझ पलिश्त में
हम तो यार की आँखों के देखने से मदहोश हैं; ये नशा है क्या, दुख़्तर-ए-रज़, जो तेरे अस्तित्व में समाया है।
7
रिंदों के तईं हमेशा मलामत करे है तू आजाइयो न शैख़ कहीं हश्त-बहिश्त में
तुम हमेशा रूहानी राहगीरों की निंदा करते हो, ऐ प्रिय। कहीं भी न आना, ऐ शेख, इस नर्क और जन्नत की दुनिया में।
8
नामे को चाक कर के करे नामा-बर को क़त्ल क्या ये लिखा था 'मीर' मरी सर-नविश्त में
नाम (नाम) को चाक करके नामा-बर (नाम लिखने वाले) को क़त्ल करना, क्या यह बात 'मीर' ने मेरे भाग्य के ग्रंथ में लिखी थी?
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