कब तक ख़राब सई-ए-तवाफ़-ए-हरम रहूँ दिल को उठा के बैठ रहूँगा कुनिश्त में

“How long shall I persist in futile rounds of the Kaaba's shrine?I'll take my heart and make a home within the temple's confine.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

मैं कब तक ख़राब सई-ए-तवाफ़-ए-हरम (काबा के चारों ओर की खराब परिक्रमा करने वाली) रहूँ और दिल को कुनिश्त (असुविधाजनक जगह) में बैठा रहूँ।

विस्तार

यह शेर गहरे आत्म-संघर्ष और आध्यात्मिक बेचैनी को दिखाता है। शायर पूछ रहे हैं कि मैं कब तक एक ख़राब या नाकाफी मुरीद बनकर, इस पावन तवाफ़ में रहूँ? उनका कहना है कि अब मैं बस कोने में बैठकर, अपने टूटे दिल का बोझ उठाए रहूँगा। यह उन दिलों की दास्तान है, जो इबादत तो करते हैं, पर खुद को गुनाहों का एहसास करते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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