ग़ज़ल

मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में

मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में

यह ग़ज़ल एक प्रेम-भंग और निराशा की भावना को दर्शाती है, जिसमें प्रेमी को प्रिय के नग्न सौंदर्य को बार-बार देखने की लालसा है। यह जीवन की क्षणभंगुरता और प्रेम की तीव्र पीड़ा को व्यक्त करती है, जिसमें वियोग और आत्मसम्मान की हानि का भाव है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में कपड़े उतारे उन ने सर खींचे हम कफ़न में
मेरी आँखें उसके नग्न शरीर को देखकर मर गईं; उन्होंने कपड़े उतारे और हमें कफ़न में घसीट दिया।
2
गुल फूल से कब उस बिन लगती हैं अपनी आँखें लाई बहार हम को ज़ोर-आवरी चमन में
शायर पूछ रहा है कि उसकी आँखें कब महबूब जैसी लगेंगी, और उससे अनुरोध कर रहा है कि उसे चमन में ज़ोर-आवरी नहीं, बल्कि कोमल बहार मिले।
3
अब लाल-ए-नौ-ख़त उस के कम बख़्शते हैं फ़रहत क़ुव्वत कहाँ रहे है याक़ूती-ए-कुहन में
अब नौ-ख़त के लाल रंग की ख़ुशी उसे कम मिलती है, और प्राचीन नीलम में अब शक्ति कहाँ बची है।
4
यूसुफ़ अज़ीज़-ए-दिल-हा जा मिस्र में हुआ था पाकीज़ा गौहरों की 'इज़्ज़त नहीं वतन में
शायर कह रहे हैं कि जिस तरह यूसुफ़ दिल के अज़ीज़ थे और मिस्र गए, उसी तरह पाक और अनमोल चीज़ों का सम्मान वतन में नहीं है।
5
दैर ओ हरम से तू तो टुक गर्म-ए-नाज़ निकला हंगामा हो रहा है अब शैख़ ओ बरहमन में
हे हरम से तुम तो इतना गरम नज़ाक का टुकड़ा लेकर निकले कि अब शैक और बरहमान में हंगामा हो रहा है।
6
आ जाते शहर में तू जैसे कि आँधी आई क्या वहशतें किया हैं हम ने दिवानपन में
जब तुम शहर में आई, तो जैसे आँधी आ गई; क्या हमने अपने दीवानगी में इतनी बर्बादी कर दी है।
7
हैं घाव दिल पर अपने तेग़-ए-ज़बाँ से सब की तब दर्द है हमारे ऐ 'मीर' हर सुख़न में
मेरे दिल पर हर किसी की ज़बान की तलवार से घाव हैं; ऐ मीर, हमारे हर एक कथन में दर्द है।
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