गुल फूल से कब उस बिन लगती हैं अपनी आँखें — मीर तक़ी मीर

गुल फूल से कब उस बिन लगती हैं अपनी आँखें लाई बहार हम को ज़ोर-आवरी चमन में

“When will my eyes resemble those of the beloved, amidst the garden's spring? Oh, give us a gentle, graceful spring, not a wild one.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

शायर पूछ रहा है कि उसकी आँखें कब महबूब जैसी लगेंगी, और उससे अनुरोध कर रहा है कि उसे चमन में ज़ोर-आवरी नहीं, बल्कि कोमल बहार मिले।

विस्तार

यह शेर प्रेम की उस मदहोशी को बयां करता है, जहाँ महबूब का जादू किसी भी प्राकृतिक सुंदरता पर भारी पड़ जाता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि जब आप अपनी ज़िंदगी में बहार लाते हैं, तो फूलों की सुंदरता भी फीकी पड़ जाती है। महबूब का असर, चमन की रौनक से कहीं ज़्यादा गहरा होता है।

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