ग़ज़ल

कहते हैं बहार आई गुल फूल निकलते हैं

कहते हैं बहार आई गुल फूल निकलते हैं

यह ग़ज़ल वसंत के आगमन और जीवन में नई उमंगों का वर्णन करती है। वक्ता कहता है कि बहार आने से फूल खिलते हैं, लेकिन उसके हृदय में भी एक अलग तरह की बेचैनी और बेचैनी बनी हुई है। वह बताता है कि अब पहले जैसी बे-होशी नहीं है, और आँसू भी अब एक दरिया की तरह उबलते हैं, जो एक गहरा भावनात्मक बदलाव दर्शाता है।

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लिपि व अर्थ
1
कहते हैं बहार आई गुल फूल निकलते हैं हम कुंज-ए-क़फ़स में हैं दिल सीनों में जलते हैं
वे कहते हैं कि बहार आई और फूल खिलते हैं, लेकिन हम तो क़फ़स के कुंज में हैं, और दिल सीनों में जल रहे हैं।
2
अब एक सी बे-होशी रहती नहीं है हम को कुछ दिल भी सँभलते हैं पर देर सँभलते हैं
अब पहले जैसी लगातार बे-होशी नहीं रहती है हम को; कुछ दिल तो सँभलते हैं, पर वे देर से सँभलते हैं।
3
वो तो नहीं इक छींटा रोने का हुआ गाहे अब दीदा-ए-तर अक्सर दरिया से उबलते हैं
वो तो नहीं बस आँसू की बूँद थी, पर अब महबूब का नज़ारा अक्सर नदी की तरह उबलता है।
4
उन पाँव को आँखों से हम मलते रहे जैसा अफ़्सोस से हाथों को अब वैसा ही मलते हैं
उन पैरों को आँखों से सहलाने जैसा जो कभी हुआ था, उसी तरह अब हम पछतावे से अपने हाथों को सहलाते हैं।
5
क्या कहिए कि आ'ज़ा सब पानी हुए हैं अपने हम आतिश-ए-हिज्राँ में यूँ ही पड़े गलते हैं
क्या कहूँ कि मेरे सारे प्रेम के जल सूख गए हैं; मैं तो बस बिछोह की आग में यूँ ही पिघल रहा हूँ।
6
करते हैं सिफ़त जब हम लाल-ए-लब-ए-जानाँ की तब कोई हमें देखे क्या ला'ल उगलते हैं
जब हम महबूब के लाल होंठों की प्रशंसा करते हैं, तो क्या कोई हमें देखता है? क्या ये सुर्ख होंठ बोलते हैं?
7
गुल फूल से भी अपने दिल तो नहीं लगते टुक जी लोगों के बेजानाँ किस तौर बहलते हैं
शायर कहते हैं कि दिल फूल से भी ज़्यादा कीमती होते हैं, लेकिन लोगों के बेपरवाह दिल किस तरह बहते रहते हैं।
8
हैं नर्म सनम गो न कहने के तईं वर्ना पत्थर हैं उन्हों के दिल काहे को पिघलते हैं
तुम्हारा दिल कोमल है, प्रिय, पर यह बात कहना नहीं चाहिए; क्योंकि उनका दिल पत्थर है, इसे कैसे पिघलाया जा सकता है।
9
ऐ गर्म-ए-सफ़र याराँ जो है सो सर-ए-रह है जो रह सको रह जाओ अब 'मीर' भी चलते हैं
ऐ दोस्त, यह यात्रा की गर्मी ही जीवन का मार्ग है; यदि तुम सह सकते हो, तो मैं, 'मीर', भी आगे बढ़ता हूँ।
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