ग़ज़ल

जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है

जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है

यह ग़ज़ल अपने प्रिय के प्रेम और बिछोह के दर्द को व्यक्त करती है, जहाँ शायर कहता है कि रोने के लिए और क्या कमी है। वह अपनी पीड़ा की तीव्रता का वर्णन करता है, जिसमें हर पल एक नया तड़प और बेचैनी है। शायर यह भी कहता है कि प्रिय की यादें और उसका प्रेम ही उसकी हर स्थिति को परिभाषित कर रहा है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है रूमाल दो दो दिन तक जूँ अब्र तर रहे है
जब मैं रोने बैठता हूँ, तो क्या कमी रह जाती है? बस एक रुमाल चाहिए जो दिन-प्रतिदिन मेरे आँसू पोंछ सके।
2
आह-ए-सहर की मेरी बर्छी के वसवसे से ख़ुर्शीद के मुँह ऊपर अक्सर सिपर रहे है
भोर की आह और मेरी बर्छी के वसवसे से, सूरज का मुख अक्सर किसी पर्दे से ढका रहता है।
3
आगह तो रहिए उस की तर्ज़-ए-रह-ओ-रविश से आने में उस के लेकिन किस को ख़बर रहे है
उसकी भक्ति और प्रेम की शैली के पास बने रहना, लेकिन यह किसी को पता नहीं कि वह कब आएगा, या किसके लिए आएगा।
4
उन रोज़ों इतनी ग़फ़लत अच्छी नहीं इधर से अब इज़्तिराब हम को दो दो पहर रहे है
उन रोज़ों से इतनी ग़फ़लत अच्छी नहीं कि इधर से भी, अब तो हम को दो-दो पहर से इज़्तिराब हो रहा है।
5
आब-ए-हयात की सी सारी रविश है उस की पर जब वो उठ चले है एक आध मर रहे है
उसकी आभा जीवन के जल के समान है, लेकिन जब वह चली जाती है, तो हम सब मरने लगे हैं।
6
तलवार अब लगा है बे-डोल पास रखने ख़ून आज कल किसू का वो शोख़ कर रहे है
तलवार अब बे-डोल पास रखी है, और वो किस का ख़ून आज कल शोख़ कर रहे हैं।
7
दर से कभू जो आते देखा है मैं ने उस को तब से उधर ही अक्सर मेरी नज़र रहे है
मैंने उस व्यक्ति को देखा है जो दरवाज़े से आता है, और तब से मेरी नज़र अक्सर उसी दिशा में रहती है।
8
आख़िर कहाँ तलक हम इक रोज़ हो चुकेंगे बरसों से वादा-ए-शब हर सुब्ह पर रहे है
आखिर कहाँ तक हम एक दिन हो पाएंगे, जब बरसों से हर सुबह पर रात का वादा रखा गया है।
9
'मीर' अब बहार आई सहरा में चल जुनूँ कर कोई भी फ़स्ल-ए-गुल में नादान घर रहे है
शायर कहते हैं कि अब बहार आ गई है रेगिस्तान में, चलो पागलपन में घूमते हैं, क्योंकि फूलों के बाग में कोई भोला घर नहीं बचा है।
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