आह-ए-सहर की मेरी बर्छी के वसवसे से — मीर तक़ी मीर

आह-ए-सहर की मेरी बर्छी के वसवसे से ख़ुर्शीद के मुँह ऊपर अक्सर सिपर रहे है

“From the whispers of my spear, in the sigh of dawn, The sun's face often remains covered by a veil.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

भोर की आह और मेरी बर्छी के वसवसे से, सूरज का मुख अक्सर किसी पर्दे से ढका रहता है।

विस्तार

यह शेर दिल की अंदरूनी बेचैनी को बयान करता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि सहर (भोर) की आहटों के वसवसे इतने गहरे हैं कि ये एक 'पर्दा' (सिपर) बना देते हैं। यह पर्दा अक्सर सूरज के चेहरे पर पड़ जाता है, जो महबूब की चमक का प्रतीक है। शायर समझाते हैं कि रूह को सताने वाले छोटे-छोटे वसवसे, सबसे तेज़ रोशनी को भी ढक लेते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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