ग़ज़ल
जब हम-कलाम हम से होता है पान खा कर
जब हम-कलाम हम से होता है पान खा कर
यह ग़ज़ल प्रेम और वियोग के जटिल भावों को दर्शाती है, जहाँ शायर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए विभिन्न उपमाओं और अनुभवों का सहारा लेता है। यह प्रेम की नशीली और रहस्यमयी दुनिया में खो जाने का अनुभव बताती है, जिसमें शायर को अपनी भावनाओं और प्रेम के गहरे अर्थों का एहसास होता है। ग़ज़ल में आत्म-समर्पण और प्रेम की पराकाष्ठा का चित्रण है।
गीत सुनें
1
जब हम-कलाम हम से होता है पान खा कर
किस रंग से करे है बातें चबा चबा कर
जब हम से पान खाकर बातें होती हैं, तो आप किस रंग से चबा-चबा कर बात करती हैं।
2
थी जुम्लातन लताफ़त आलम में जाँ के हम तो
मिट्टी में अट गए हैं इस ख़ाक-दाँ में आ कर
जुम्लातन लताफ़त आलम में जान देकर हम तो मिट्टी में अट गए हैं इस ख़ाक-दाँ में आ कर।
3
सई ओ तलब बहुत की मतलब के तईं न पहुँचे
नाचार अब जहाँ से बैठे हैं हाथ उठा कर
हे प्रिय, तुम्हारी इच्छा का अर्थ मुझ तक नहीं पहुंचा है, अब मैं जहाँ बैठा हूँ, मैंने हाथ उठाकर लाचारी व्यक्त की है।
4
ग़ैरत ये थी कि आया उस से जो मैं ख़फ़ा हो
मरते मुआ पे हरगिज़ ऊधर फिरा न जा कर
मेरी ग़ैरत यह थी कि मैं उस व्यक्ति से जो मुझे ख़फ़ा करता था, कभी भी, यहाँ तक कि मरने के बाद भी, उससे दूर नहीं भटकूँगा।
5
क़ुदरत ख़ुदा की सब में ख़लउल-इज़ार आओ
बैठो जो मुझ कने तो पर्दे में मुँह छुपा कर
खुदा की क़ुदरत से हर चीज़ में पर्दा हटा है; अगर तुम मेरे पास बैठो, तो अपना मुँह पर्दे में छिपा लेना।
6
अरमान है जिन्हों को वे अब करें मोहब्बत
हम तो हुए पशीमाँ दिल के तईं लगा कर
जिन लोगों से उन्हें अब मोहब्बत करनी है, उनके लिए वे अरमान रखते हैं, लेकिन मैं दिल की ज़िद लगा कर पछता गया।
7
मैं 'मीर' तर्क ले कर दुनिया से हाथ उठाया
दरवेश तू भी तो है हक़ में मिरे दुआ कर
मैं, 'मीर', तर्क लेकर दुनिया से हाथ उठा चुका हूँ; दरवेश, तू भी तो मेरे हक़ में है, इसलिए मेरे लिए दुआ कर।
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