ग़ैरत ये थी कि आया उस से जो मैं ख़फ़ा हो — मीर तक़ी मीर

ग़ैरत ये थी कि आया उस से जो मैं ख़फ़ा हो मरते मुआ पे हरगिज़ ऊधर फिरा न जा कर

“My pride was that I would never stray, even in death, from the one who made me upset.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

मेरी ग़ैरत यह थी कि मैं उस व्यक्ति से जो मुझे ख़फ़ा करता था, कभी भी, यहाँ तक कि मरने के बाद भी, उससे दूर नहीं भटकूँगा।

विस्तार

यह शेर सिर्फ़ एक शिकायत नहीं है, बल्कि एक इश्क़ की बहुत गहरी समझ है। मिर्ज़ा तक़ी मीर बता रहे हैं कि उनका घमंड (ग़ैरत) यह था कि जब वह नाराज़ होते थे, तो महबूब कहीं और नहीं जा सकता था। मतलब, उनका गुस्सा ही महबूब के लिए एक रुकावट बन जाता था। यह शे'र बताता है कि मोहब्बत में भावनाएँ कितनी ताकतवर होती हैं, कि एक ख़फ़ा होना ही किसी के लिए बड़ी सज़ा बन जाए।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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