ग़ज़ल
इस अहद में इलाही मोहब्बत को क्या हुआ
इस अहद में इलाही मोहब्बत को क्या हुआ
यह ग़ज़ल पूछती है कि आज के दौर में प्रेम और वफ़ा को क्या हुआ। इसमें शायर ने टूटे वादों, निराशा और दर्द भरे अनुभवों के माध्यम से जीवन की अनिश्चितता और प्रेम की स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
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1
इस अहद में इलाही मोहब्बत को क्या हुआ
छोड़ा वफ़ा को उन ने मुरव्वत को क्या हुआ
इस युग में, ईश्वरीय प्रेम का क्या हुआ? उन्होंने वफ़ादारी और शिष्टाचार/सभ्यता का क्या किया?
2
उम्मीद-वार-ए-वादा-ए-दीदार मर चले
आते ही आते यारो क़यामत को क्या हुआ
उम्मीदों और दीदार के वादों से भरे फूल मर गए; यारो, जब तुम आते हो, तो क्या हुआ क़यामत को?
3
कब तक तज़ल्लुम आह भला मर्ग के तईं
कुछ पेश आया वाक़िआ' रहमत को क्या हुआ
हे प्रिय मृत्यु के, कब तक यह अत्याचार रहेगा? क्या कोई घटना हुई है, या रहमत का क्या हुआ?
4
उस के गए पर ऐसे गए दिल से हम-नशीं
मालूम भी हुआ न कि ताक़त को क्या हुआ
उसके जाने पर ऐसे गए दिल से हम-नशीं, मालूम भी हुआ न कि ताक़त को क्या हुआ।
5
बख़्शिश ने मुझ को अब्र-ए-करम की किया ख़जिल
ऐ चश्म जोश-ए-अश्क-ए-नदामत को क्या हुआ
बख्शीश ने मुझे अपनी कृपा के पर्दे से शर्मसार कर दिया, ऐ आँखों के जोश से भरे आँसू के सागर, पश्चाताप के आँसू का क्या हुआ?
6
जाता है यार तेग़-ब-कफ़ ग़ैर की तरफ़
ऐ कुश्ता-ए-सितम तिरी ग़ैरत को क्या हुआ
दोस्त, तुम अपना गुस्सा निर्दोषों की तरफ़ क्यों कर रहे हो? हे अत्याचार के युद्ध, तुम्हारी इज़्ज़त का क्या हुआ?
7
थी साब आशिक़ी की बदायत ही 'मीर' पर
क्या जानिए कि हाल-ए-निहायत को क्या हुआ
शायर कहता है कि प्रेम की वृद्धि पर, वह क्या जान सकता है कि अत्यधिक दुःख की स्थिति का क्या हुआ।
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