ग़ज़ल

चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया

चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया

यह ग़ज़ल एक फूल (गुल) के दावे की बात करती है, जिसने अपने सौंदर्य (जमाल) का दावा किया। इस सौंदर्य के कारण, प्रियतम (यार) ने उसे बहुत लाल कर दिया, और आकाश (फ़लक) ने उसकी रहमत में कवि को पैदा किया। अंत में, कवि कहता है कि उसकी आँखें अब ज़ोफ़ से नहीं खुलतीं, क्योंकि प्रियतम ने नींद में ये ख़याल किया।

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया जमाल-ए-यार ने मुँह उस का ख़ूब लाल किया
चमन में फूल ने जो कभी सुंदरता का दावा किया, यार की सुंदरता ने उसका मुख बहुत लाल कर दिया।
2
फ़लक ने आह तिरी रह में हम को पैदा कर ब-रंग-ए-सब्ज़-ए-नूरस्ता पाएमाल किया
आसमान ने आपकी रहमत में मुझे जन्म दिया और मुझे नूर की हरी-भरी, रंगीन चमक से सजाया।
3
रही थी दम की कशाकश गले में कुछ बाक़ी सो उस की तेग़ ने झगड़ा ही इंफ़िसाल किया
गले में अभी भी जान की साँस बची थी, लेकिन उसकी तलवार की धार ने ही बिछड़ना कर दिया।
4
मिरी अब आँखें नहीं खुलतीं ज़ोफ़ से हमदम न कह कि नींद में है तू ये क्या ख़याल किया
मेरे अब आँखें नहीं खुलतीं ज़ोफ़ से हमदम, न कह कि नींद में है तू ये क्या ख़याल किया। इसका अर्थ है कि मेरे अब आँखें तुम्हारी मदहोशी से नहीं खुलतीं, प्रिय; तुम यह मत कहो कि मैं सिर्फ़ सपने में हूँ—तुमने क्या विचार किए हैं।
5
बहार-ए-रफ़्ता फिर आई तिरे तमाशे को चमन को युम्न-ए-क़दम ने तिरे निहाल किया
बहार-ए-रफ़्ता (प्रिय के दूर जाने का मौसम) फिर आई आपके तमाशे के लिए; आपके कदमों की नद से बाग को खुशहाल किया।
6
जवाब-नामा सियाही का अपनी है वो ज़ुल्फ़ किसू ने हश्र को हम से अगर सवाल किया
जवाब-नामा सियाही का अपनी है वो ज़ुल्फ़, किसू ने हश्र को हम से अगर सवाल किया। इसका शाब्दिक अर्थ है कि स्याही के जवाब-नाम (जवाब-नामा) की वो ज़ुल्फ़ (लहराती काली घटा) उसकी अपनी है, और अगर किसी ने क़यामत (हश्र) के दिन हमसे सवाल किया, तो क्या पता चलेगा।
7
लगा न दिल को कहीं क्या सुना नहीं तू ने जो कुछ कि 'मीर' का इस आशिक़ी ने हाल किया
तुमने मेरे दिल को कहीं कुछ नहीं बताया, जो 'मीर' की इस मोहब्बत ने हाल किया है।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.