ग़ज़ल
वस्तु है ग्राहक नहीं , वस्तु सागर अनमोल। बिना करम का मानव , फिरैं डांवाडोल॥
वस्तु है ग्राहक नहीं , वस्तु सागर अनमोल। बिना करम का मानव , फिरैं डांवाडोल॥
कबीर के ये दोहे एक ऐसे संसार की आलोचना करते हैं जो आध्यात्मिक सत्य के प्रति अंधा है, जहाँ सच्ची भक्ति दुर्लभ है। वे कहते हैं कि काम, क्रोध और लोभ में डूबे लोग भक्ति प्राप्त नहीं कर सकते, जिसके लिए सामाजिक पहचान से ऊपर उठना आवश्यक है। कबीर एक सतर्क आध्यात्मिक अभ्यास का समर्थन करते हैं, जिसमें परमात्मा से अटूट संबंध बनाए रखना चाहिए।
गीत सुनें
1
वस्तु है ग्राहक नहीं , वस्तु सागर अनमोल। बिना करम का मानव , फिरैं डांवाडोल॥
वस्तु ग्राहक नहीं, वह सागर के समान अमूल्य है। जिसके जीवन में कर्म नहीं, वह मनुष्य दिशाहीन भटकता है।
2
कली खोटा जग आंधरा , शब्द न माने कोय। चाहे कहँ सत आइना , जो जग बैरी होय॥
कली कहता है कि यह जग झूठा और अंधकारमय है, जहाँ कोई भी शब्द नहीं मानता। वह पूछता है कि यदि संसार ही शत्रु है, तो वह सच कहाँ कहेगा।
3
कामी , क्रोधी , लालची , इनसे भक्ति न होय। भक्ति करे कोइ सूरमा , जाति वरन कुल खोय॥
कामी, क्रोधी और लालची—इन गुणों से भक्ति नहीं होती। भक्ति केवल कोई सच्चा और साहसी व्यक्ति करता है, जिसमें जाति, वर्ण और कुल का त्याग करना पड़ता है।
4
जागन में सोवन करे , साधन में लौ लाय। सूरत डोर लागी रहे , तार टूट नाहिं जाय॥
जागने के समय दीपक जलाए रखना और साधन में निरंतर ऊर्जा बनाए रखना चाहिए। जीवन का यह डोर जुड़ा रहे, ताकि यह कभी टूट न जाए।
5
साधु ऐसा चहिए , जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहे , थोथ देइ उड़ाय॥
साधु ऐसा चाहिए, जो सूप के स्वभाव जैसा हो। वह सार-सार को ग्रहण करे और व्यर्थ को उड़ा दे।
6
लगी लग्न छूटे नाहिं , जीभ चोंच जरि जाय। मीठा कहा अंगार में , जाहि चकोर चबाय॥
जो बंधन बंध गया है, वह टूट नहीं सकता; मेरी जीभ निश्चित रूप से आग में जल जाएगी। मिठास में कोयला है; इस कारण चकोर इसे चबाता है।
7
भक्ति गेंद चौगान की , भावे कोई ले जाय। कह कबीर कुछ भेद नाहिं , कहां रंक कहां राय॥
भक्ति का गेंद चौगान की, कौन ले जा सकता है। कबीर कहते हैं कि कोई भेद नहीं है, न ही रंक है और न ही राय।
8
घट का परदा खोलकर , सन्मुख दे दीदार। बाल सनेही सांइयाँ , आवा अन्त का यार॥
घट का परदा खोलकर, उसने सामने दीदार दिखाया। हे बाल सनेही सांइयाँ, तू ही अंत का यार है।
9
अन्तर्यामी एक तुम , आत्मा के आधार। जो तुम छोड़ो हाथ तो , कौन उतारे पार॥
अन्तर्यामी यानी भीतर रहने वाले, तुम ही आत्मा का आधार हो। यदि तुम अपना हाथ छोड़ दोगे, तो कौन तुम्हें पार लगाएगा।
10
मैं अपराधी जन्म का , नख-सिख भरा विकार। तुम दाता दु:ख भंजना , मेरी करो सम्हार॥
मैं जन्म से अपराधी हूँ, हर अंग में दोष भरा विकार। हे दाता, तुम दुःख का भंजन करो, और मेरे हृदय का संहार करो।
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