“The object is not the customer, the object is the priceless ocean. A human without virtue wanders aimlessly.”
वस्तु ग्राहक नहीं, वह सागर के समान अमूल्य है। जिसके जीवन में कर्म नहीं, वह मनुष्य दिशाहीन भटकता है।
कबीर जी इस दोहे में एक बहुत गहरी बात समझा रहे हैं, वो कहते हैं कि किसी भी चीज़ की असली कीमत ग्राहक या उसके लेन-देन से नहीं होती, बल्कि वो चीज़ खुद एक अनमोल सागर की तरह बेशकीमती है। इसका मतलब है कि ज़िंदगी का सच्चा मोल बाहरी दिखावे या बाज़ार के भाव से नहीं लगता, बल्कि उसके अपने अंदरूनी मूल्य में होता है। ठीक वैसे ही, एक इंसान की असल पहचान उसके अच्छे कर्मों और स्वभाव से बनती है। जिसके पास ये 'करम' नहीं होते, वो जीवन भर बिना किसी लक्ष्य के डाँवाडोल भटकता रहता है, जैसे बिन पतवार की नाव।
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