लगी लग्न छूटे नाहिं , जीभ चोंच जरि जाय। मीठा कहा अंगार में , जाहि चकोर चबाय॥

“The bond has been formed, and it cannot be broken; my tongue will surely burn in the flame. In the sweetness, there is coal; thus, the Chakora chews (on it).”

— कबीर
अर्थ

जो बंधन बंध गया है, वह टूट नहीं सकता; मेरी जीभ निश्चित रूप से आग में जल जाएगी। मिठास में कोयला है; इस कारण चकोर इसे चबाता है।

विस्तार

कबीरदास जी इस दोहे में बताते हैं कि एक बार जब प्रेम या भक्ति का अटूट बंधन बन जाता है, तो उसे तोड़ना असंभव सा हो जाता है। वे चकोर पक्षी का उदाहरण देते हैं, जो चाँद के प्रेम में अंगारों को भी मीठा समझकर चबा जाता है, ठीक वैसे ही भक्त भी इस रिश्ते में होने वाले हर कष्ट को खुशी-खुशी स्वीकार कर लेता है। यह हमें सिखाता है कि सच्चे प्रेम या सत्य के मार्ग पर चलते हुए आने वाली हर कठिनाई को सहर्ष अपनाना ही हमारी सच्ची निष्ठा है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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