“Who picks up the essence and makes the rest fly away.”
साधु ऐसा चाहिए, जो सूप के स्वभाव जैसा हो। वह सार-सार को ग्रहण करे और व्यर्थ को उड़ा दे।
कबीर दास जी इस दोहे में बताते हैं कि एक संत को सूप की तरह होना चाहिए। जैसे सूप अनाज को भूसे से अलग करता है, ठीक वैसे ही संत को जीवन की सच्चाई और ज्ञान में से सार तत्व को ग्रहण करना चाहिए। उसे व्यर्थ की बातें और माया को छोड़ देना चाहिए और केवल असली ज्ञान को ही अपने पास रखना चाहिए। यह हमें सिखाता है कि जीवन में क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं, इसे पहचानने की समझ कितनी ज़रूरी है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
