ग़ज़ल
जिसहि न कोई विसहि तू , जिस तू तिस सब कोई। दरिगह तेरी सांइयाँ , जा मरूम कोइ होइ॥
जिसहि न कोई विसहि तू , जिस तू तिस सब कोई। दरिगह तेरी सांइयाँ , जा मरूम कोइ होइ॥
कबीर की यह वाणी ईश्वर के साथ गहन संबंध और सदाचारी जीवन के महत्व पर जोर देती है। यह ईश्वर के परित्यक्तों के लिए अटूट समर्थन, संसार पर उनके सहज नियंत्रण और जीवन की चुनौतियों के बीच उनकी सुरक्षा को दर्शाती है। ये पद विनम्र और मधुर वाणी की भी वकालत करते हैं, यह सुझाव देते हैं कि ईश्वर के नाम के प्रति सच्ची भक्ति अपार आध्यात्मिक धन और शांति लाती है।
गीत सुनें
1
जिसहि न कोई विसहि तू , जिस तू तिस सब कोई। दरिगह तेरी सांइयाँ , जा मरूम कोइ होइ॥
जिसको आप याद नहीं करते, या जिसे आप याद करते हैं, या कोई और, आपकी कृपा से, हे प्रिय, किसी को न मरना चाहिए।
2
साँई मेरा वाणियां , सहति करै व्यौपार। बिन डांडी बिन पालड़ै तौले सब संसार॥
मेरी प्यारी वाणी हर प्रकार के व्यवहार को सहती है। बिना डंडी और बिना पालड़ के, पूरी दुनिया इसका मूल्यांकन करती है।
3
झल बावै झल दाहिनै , झलहि माहि त्योहार। आगै-पीछै झलमाई , राखै सिरजनहार॥
बाएँ की ओर, दाएँ की ओर, और पानी में कोई त्योहार नहीं। आगे-पीछे झूलते हुए, वह सिर सजाने वाला (केश सज्जा करने वाला) संतुलन बनाए रखता है।
4
एसी बाणी बोलिये , मन का आपा खोइ। औरन को सीतल करै , आपौ सीतल होइ॥ 415॥ कबीर हरि कग नाव सूँ प्रीति रहै इकवार। तौ मुख तैं मोती झड़ै हीरे अन्त न पार॥
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोइए। औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होइए। कबीर, हरि के नाम से प्रेम रहता एक बार। तो मुख से मोती झड़ै हीरे अंत न पार।
5
बैरागी बिरकत भला , गिरही चित्त उदार। दुहुँ चूका रीता पड़ै वाकूँ वार न पार॥
बैरागी और बिरकत (गरीबी) भला, और गिरही चित्त तथा उदार मन भला। इन दोनों प्रकार के गुणों पर मेरे वचनों से कोई वार या पार नहीं होता।
6
कोई एक राखै सावधां , चेतनि पहरै जागि। बस्तर बासन सूँ खिसै , चोर न सकई लागि॥
कोई एक व्यक्ति सावधानी से रखवाली करता है, और चेतना जागृत रहती है। शरीर का धन फिसल जाता है, जिसे चोर नहीं ले जा सकता।
7
बारी-बारी आपणीं , चले पियारे म्यंत। तेरी बारी रे जिया , नेड़ी आवै निंत॥
बारी-बारी से चलते हैं मेरे प्रियतम। हे प्राण, अब तुम्हारी बारी है, तुम्हें नींद आ रही है।
8
पदारथ पेलि करि , कंकर लीया हाथि। जोड़ी बिछटी हंस की , पड़या बगां के साथि॥
महल की सुख-सुविधा छोड़कर, हाथ में कंकड़ लिए, हंस से बिछड़कर, वह झुंड के साथ भटक गया।
9
निंदक नियारे राखिये , आंगन कुटि छबाय। बिन पाणी बिन सबुना , निरमल करै सुभाय॥
निंदक को पास रखना चाहिए, जैसे आंगन के कोने में कुटिया बनाना। वह बिना पानी या साबुन के ही स्वभाव को स्वच्छ कर देता है।
10
गोत्यंद के गुण बहुत हैं , लिखै जु हिरदै मांहि। डरता पाणी जा पीऊं , मति वै धोये जाहि॥
गोत्यंद के गुण हृदय में लिखे हैं, पर पानी से डरकर जब वह पीता है, तो उसकी बुद्धि धुल जाती है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
