पदारथ पेलि करि , कंकर लीया हाथि। जोड़ी बिछटी हंस की , पड़या बगां के साथि॥ 420॥
“Having left the comfort of the palace, with pebbles in hand, separated from its mate, the swan strayed with the flock.”
— कबीर
अर्थ
महल की सुख-सुविधा छोड़कर, हाथ में कंकड़ लिए, हंस से बिछड़कर, वह झुंड के साथ भटक गया।
विस्तार
कबीर दास जी ने यहाँ हंस के रूपक से हमारी अपनी यात्रा को समझाया है। जैसे एक हंस महल का सुख छोड़कर कंकड़ उठा लेता है और अपने साथी से बिछड़कर बगुले की संगत में पड़ जाता है, वैसे ही हम भी अपनी आत्मिक शांति और सच्चे लक्ष्य को छोड़कर दुनियावी चीज़ों के पीछे भागने लगते हैं। इस तरह हम अपनी असल पहचान भूलकर भटक जाते हैं और भीड़ में खो जाते हैं।
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