झल बावै झल दाहिनै , झलहि माहि त्योहार। आगै-पीछै झलमाई , राखै सिरजनहार॥ 414॥
“Lest the left, lest the right, lest there be a festival in the water. Ever swaying before and behind, the one who adorns the head (the hair-dresser/stylist) maintains (the balance).”
— कबीर
अर्थ
बाएँ की ओर, दाएँ की ओर, और पानी में कोई त्योहार नहीं। आगे-पीछे झूलते हुए, वह सिर सजाने वाला (केश सज्जा करने वाला) संतुलन बनाए रखता है।
विस्तार
यह दोहा कबीरदास जी की अद्भुत कल्पना को दर्शाता है, जहाँ 'झल' यानी पानी की हलचल को जीवन की अस्थिरता और मन की चंचलता से जोड़ा गया है। चारों ओर के विकर्षणों और भावनाओं के ज्वार-भाटे के बीच, 'सिरजनहार' ही है जो हमें स्थिर रखता है। यह हमें सिखाता है कि बाहरी दुनिया के उतार-चढ़ाव में भी, भीतर की शांति और ईश्वर पर विश्वास हमें संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
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