“The ascetic, the renouncer, and the poor, the generous heart, the exalted mind; on all these qualities, my words are insufficient to fully explain.”
बैरागी और बिरकत (गरीबी) भला, और गिरही चित्त तथा उदार मन भला। इन दोनों प्रकार के गुणों पर मेरे वचनों से कोई वार या पार नहीं होता।
कबीर दास जी इस दोहे में जीवन के दो महत्वपूर्ण रास्तों की बात करते हैं - एक बैरागी का, जिसका सच्चा गुण वैराग्य और निस्पृहता है; और दूसरा गृहस्थ का, जिसकी शोभा उदार मन और परोपकार में है। वे समझाते हैं कि इन दोनों में से कोई भी अगर अपने मूल गुण से भटक जाए, यानी बैरागी मोह में पड़ जाए या गृहस्थ का चित्त संकीर्ण हो जाए, तो उनका जीवन खाली और निरर्थक हो जाता है। ऐसे में उन्हें फिर कोई किनारा नहीं मिलता, वे भंवर में फंस जाते हैं; मानो जीवन की नैया बिना पतवार के हो जाए।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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