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ग़ज़ल

कबीर 161-170

کبیر 161-170
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के ये पद वाणी के महत्व को दर्शाते हैं, जहाँ कठोर वचन हानि पहुँचाते हैं और मृदु वचन अमृत बरसाते हैं। वे केवल बातों की अपेक्षा सारगर्भित ज्ञान को प्राथमिकता देते हैं और बताते हैं कि मन कैसे अपनी संगति के अनुसार फल पाता है। अंत में, कबीर कहते हैं कि लोहा एक ही होता है पर गढ़ने में अंतर उसे कवच या तलवार बनाता है, जो व्यक्ति के निर्माण का प्रतीक है।

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1
कुटिल बचन सबसे बुरा , जासे होत हारसाधु वचन जल रूप है , बरसे अम्रत धार163
कुटिल वचन सबसे बुरे होते हैं, जो कभी हार नहीं मानते। साधु के वचन जल के रूप में होते हैं, जिनमें अमृत की धारा बरसती है।
2
कहता तो बहूँना मिले , गहना मिला कोयसो कहता वह जान दे , जो नहीं गहना कोय164
अगर मैं बोलूँ तो बहन मिले, पर गहना नहीं मिलता। अगर आप बता दें तो, क्योंकि मेरे पास कोई गहना नहीं है।
3
कबीरा मन पँछी भया , भये ते बाहर जायजो जैसे संगति करै , सो तैसा फल पाय165
कबीरा कहते हैं कि मन एक पंछी के समान है जो बाहर उड़ जाता है। जो व्यक्ति किस तरह की संगत करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।
4
कबीरा लोहा एक है , गढ़ने में है फेरताहि का बखतर बने , ताहि की शमशेर166
कबीरा कहते हैं कि लोहा एक है, और इसे गढ़ने का काम फेर (परिवर्तन/चक्र) करता है। उसी लोहे से बख़्तर (किताब) और शमशीर (तलवार) दोनों बनाए जा सकते हैं।
5
कहे कबीर देय तू , जब तक तेरी देहदेह खेह हो जाएगी , कौन कहेगा देह167
कबीर कहते हैं कि जब तक यह शरीर है, तुम क्या देते रहोगे? जब शरीर ही न रहेगा, तो कौन शरीर को याद करेगा।
6
करता था सो क्यों किया , अब कर क्यों पछितायबोया पेड़ बबूल का , आम कहाँ से खाय168
जो काम पहले किया, वह क्यों किया, और अब उसका पछतावा क्यों करते हो? तुमने बबूल का पेड़ लगाया, तो आम कहाँ से खाओगे।
7
कस्तूरी कुन्डल बसे , म्रग ढ़ूंढ़े बन माहिंऐसे घट-घट राम है , दुनिया देखे नाहिं169
कस्तूरी तो नाभि में निवास करती है, पर हिरण उसे जंगल में खोजता है। ठीक इसी प्रकार, हर हृदय में राम निवास करते हैं, पर संसार उन्हें नहीं देख पाता।
8
कबीरा सोता क्या करे , जागो जपो मुरारएक दिना है सोवना , लांबे पाँव पसार170
कबीरा, सोने में क्या रखा है, जागकर मुरारी का जाप करो। सोना तो बस एक दिन है, अपने लंबे पैर फैला दो।
9
कागा काको घन हरे , कोयल काको देयमीठे शब्द सुनाय के , जग अपनो कर लेय171
कागा काको घन हरे, कोयल काको देय। मीठे शब्द सुनाय के, जग अपनो कर लेय। इसका शाब्दिक अर्थ है कि कागा और काको, जो घने हरे जंगल में हैं, और कोयल जो काको को भेंट देती है। जिनके मीठे शब्द सुने जाते हैं, संसार उन्हें अपना लेता है।
10
कबिरा सोई पीर है , जो जा नैं पर पीरजो पर पीर जानइ , सो काफिर के पीर172कबिरा मनहि गयन्द है , आकुंश दै-दै राखिविष की बेली परि रहै , अम्रत को फल चाखि173
कबिरा (कबीर) कहते हैं कि सच्चा पीर वह है जो किसी पर निर्भर न हो; जो किसी पर निर्भर होता है, वह काफिर का पीर कहलाता है। मन एक पंछी है जिसे मोर ने पकड़ा है और जो पीड़ा में रहता है; वह विष के हार में लिपटा है, फिर भी अमृत का फल चखना चाहता है।
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