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कबीरा मन पँछी भया , भये ते बाहर जाय। जो जैसे संगति करै , सो तैसा फल पाय॥ 165॥

Kabira, the mind is like a bird, which flies outside. The fruit one receives is like the company one keeps.

कबीर
अर्थ

कबीरा कहते हैं कि मन एक पंछी के समान है जो बाहर उड़ जाता है। जो व्यक्ति किस तरह की संगत करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ मन को एक आज़ाद पंछी कहते हैं, जो कहीं भी उड़कर जा सकता है। इसका मतलब है कि हमारा मन भटकता रहता है, पर ये कितना ज़रूरी है कि हम इसे अच्छी संगति में रखें। जैसे हम बीज बोते हैं, वैसे ही फल मिलता है; ठीक वैसे ही जैसी हमारी संगत होगी, वैसे ही हमें जीवन में परिणाम मिलेंगे। इसलिए हमेशा अच्छी संगति चुनना बहुत मायने रखता है।

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