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कबीरा लोहा एक है , गढ़ने में है फेर। ताहि का बखतर बने , ताहि की शमशेर॥ 166॥

The iron of Kabir is one; the process of forging it is the crucible. From that same iron, a book and a sword are created.

कबीर
अर्थ

कबीरा कहते हैं कि लोहा एक है, और इसे गढ़ने का काम फेर (परिवर्तन/चक्र) करता है। उसी लोहे से बख़्तर (किताब) और शमशीर (तलवार) दोनों बनाए जा सकते हैं।

विस्तार

देखो, कबीर दास जी कितनी गहरी बात कहते हैं कि लोहा तो एक ही होता है, है ना? पर उसे ढालने वाले कारीगर का कमाल है कि उसी एक लोहे से कभी ज्ञान की किताब बन जाती है और कभी युद्ध में काम आने वाली तेज तलवार। ये हमें बताता है कि इंसान के भीतर भी अपार संभावनाएं होती हैं; असल बात ये है कि हम अपनी उस क्षमता को किस तरह पहचानते और तराशते हैं। भीतर से हम सब एक जैसे हैं, पर हमारी गढ़ाई ही तय करती है कि हम क्या बनते हैं।

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पाठ
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