ग़ज़ल

वो अदा-ए-दिलबरी हो कि नवा-ए-आशिक़ाना

وہ ادائے دلبری ہو کہ نوائے عاشقانہ

यह ग़ज़ल प्रेम और सौंदर्य के उस जादुई प्रभाव को रेखांकित करती है जो दिलों को जीत कर दुनिया पर राज करता है। इसमें महबूब के बेमिसाल हुस्न, दिलकश अदाओं और आशिक़ के गहरे समर्पण को रूमानी और पुरअसर अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
वो अदा-ए-दिलबरी हो कि नवा-ए-आशिक़ाना जो दिलों को फ़त्ह कर ले वही फ़ातेह-ए-ज़माना
चाहे वह दिल लुभाने की अदा हो या आशिक़ की सदा, जो लोगों के दिलों को जीत ले वही इस ज़माने का सच्चा विजेता है।
2
ये तिरा जमाल-ए-कामिल ये शबाब का ज़माना दिल-ए-दुश्मनाँ सलामत दिल-ए-दोस्ताँ निशाना
तुम्हारा यह पूर्ण सौंदर्य और जवानी का यह दौर ऐसा है कि दुश्मनों के दिल तो सुरक्षित रहते हैं, लेकिन चाहने वालों के दिल निशाने पर आ जाते हैं।
3
कभी हुस्न की तबीअत न बदल सका ज़माना वही नाज़-ए-बे-नियाज़ी वही शान-ए-ख़ुसरवाना
ज़माना कभी भी हुस्न के स्वभाव को नहीं बदल सका, उसमें आज भी वही बेपरवाही का नाज़ और वही बादशाही शान मौजूद है।
4
मैं हूँ उस मक़ाम पर अब कि फ़िराक़ ओ वस्ल कैसे मिरा इश्क़ भी कहानी तिरा हुस्न भी फ़साना
अब मैं ऐसे मुक़ाम पर हूँ जहाँ मिलन और जुदाई का कोई मतलब नहीं बचा; मेरा प्यार भी महज़ एक कहानी बन गया है और तुम्हारा हुस्न भी सिर्फ़ एक अफ़साना।
5
मिरी ज़िंदगी तो गुज़री तिरे हिज्र के सहारे मिरी मौत को भी प्यारे कोई चाहिए बहाना
मेरी ज़िंदगी तो तुम्हारे विरह के सहारे बीत गई, लेकिन ऐ महबूब, अब मेरी मौत के लिए भी तो कोई बहाना चाहिए।
6
तिरे इश्क़ की करामत ये अगर नहीं तो क्या है कभी बे-अदब न गुज़रा मिरे पास से ज़माना
अगर यह तुम्हारे इश्क़ का चमत्कार नहीं है तो और क्या है, कि यह ज़माना कभी मेरे पास से बेअदबी के साथ नहीं गुज़रा।
7
तिरी दूरी ओ हुज़ूरी का ये है अजीब आलम अभी ज़िंदगी हक़ीक़त अभी ज़िंदगी फ़साना
तुम्हारी दूरी और मौजूदगी की यह अजीब हालत है कि एक पल ज़िंदगी हक़ीक़त लगती है और अगले ही पल एक फ़साना।
8
मिरे हम-सफ़ीर बुलबुल मिरा तेरा साथ ही क्या मैं ज़मीर-ए-दश्त-ओ-दरिया तू असीर-ए-आशियाना
ऐ मेरे हम-आवाज़ बुलबुल! मेरा और तेरा क्या साथ? मैं जंगल और समंदर का दिल और रूह हूँ, जबकि तू अपने घोंसले का क़ैदी है।
9
मैं वो साफ़ ही न कह दूँ जो है फ़र्क़ मुझ में तुझ में तिरा दर्द दर्द-ए-तन्हा मिरा ग़म ग़म-ए-ज़माना
क्या मैं साफ़-साफ़ बता न दूँ कि मुझमें और तुझमें क्या फ़र्क़ है? तुम्हारा दर्द सिर्फ़ तुम्हारी तन्हाई का दुख है, जबकि मेरा ग़म सारी दुनिया का ग़म है।
10
तिरे दिल के टूटने पर है किसी को नाज़ क्या क्या तुझे ऐ 'जिगर' मुबारक ये शिकस्त-ए-फ़ातेहाना
तुम्हारे दिल के टूटने पर किसी को कितना नाज़ और घमंड है। हे जिगर, तुम्हें अपनी यह शानदार और विजयी जैसी हार बहुत मुबारक हो।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.