ग़ज़ल
ज़मीर-ए-लाला मय-ए-लाल से हुआ लबरेज़
ज़मीर-ए-लाला मय-ए-लाल से हुआ लबरेज़
यह ग़ज़ल प्रेम के नशीले प्रभाव का वर्णन करती है, जिसमें शायर ने बताया है कि लाला के ज़मीर का लाल के मय से नशा हो गया है। प्रेम के इशारे से सूफ़ी ने परहेज़ तोड़ दी और इश्क़ ने अपनी बिसात बिछाई। शायर के अनुसार, प्रेम की नज़रों का घूमना ही जीवन को अस्त-व्यस्त कर देने वाला हंगामा है।
गीत सुनें
1
ज़मीर-ए-लाला मय-ए-लाल से हुआ लबरेज़
इशारा पाते ही सूफ़ी ने तोड़ दी परहेज़
लाला का ज़मीर, लाल के मय से मदहोश हुआ, और इशारा मिलते ही सूफ़ी ने अपना संयम तोड़ दिया।
2
बिछाई है जो कहीं इश्क़ ने बिसात अपनी
किया है उस ने फ़क़ीरों को वारिस-ए-परवेज़
जहाँ कहीं इश्क़ ने अपनी बिसात बिछाई है, उसने वहाँ के फ़क़ीरों को परवेज़ का वारिस बना दिया है।
3
पुराने हैं ये सितारे फ़लक भी फ़र्सूदा
जहाँ वो चाहिए मुझ को कि हो अभी नौ-ख़ेज़
ये तारे पुराने हैं और आकाश भी जीर्ण-शीर्ण है, पर जहाँ मुझे ये चाहिए, वहाँ ये अभी नए बने हों।
4
किसे ख़बर है कि हंगामा-ए-नशूर है क्या
तिरी निगाह की गर्दिश है मेरी रुस्ता-ख़ेज़
किसे पता कि यह कैसा हंगामा-ए-नशूर है, क्या यह तेरी निगाह की गर्दिश है जो मुझे भटकने पर मजबूर कर रही है।
5
न छीन लज़्ज़त-ए-आह-ए-सहर-गही मुझ से
न कर निगह से तग़ाफ़ुल को इल्तिफ़ात आमेज़
मुझसे सुबह की आह का आनंद न छीनना, और न ही अपनी नज़र से इस प्यारे व्यवहार को अनदेखा करना।
6
दिल-ए-ग़मीं के मुआफ़िक़ नहीं है मौसम-ए-गुल
सदा-ए-मुर्ग़-ए-चमन है बहुत नशात अंगेज़
ग़म से भरे दिल के अनुरूप नहीं है फूलों का मौसम; बाग़ में कोयल की आवाज़ बहुत अधिक उल्लास से भरी है।
7
हदीस-ए-बे-ख़बराँ है तू बा ज़माना ब-साज़
ज़माना बा तो न साज़द तू बा ज़माना सातेज़
तुम दुनिया के फैशन के एक साधारण अनुकरण मात्र हो; तुम युग के एक मात्र नक़ल करने वाले हो, और युग स्वयं ही संगीत के स्वामी है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
