न छीन लज़्ज़त-ए-आह-ए-सहर-गही मुझ से
न कर निगह से तग़ाफ़ुल को इल्तिफ़ात आमेज़
“Do not snatch the pleasure of this dawn's sigh from me, Nor let your glance ignore this affectionate grace.”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
मुझसे सुबह की आह का आनंद न छीनना, और न ही अपनी नज़र से इस प्यारे व्यवहार को अनदेखा करना।
विस्तार
यह शेर इश्क़ के उस गहरे दर्द को बयां करता है जब महबूब का साथ मिलना भी एक तरह का दर्द बन जाता है। शायर कहते हैं कि मेरे से वो सहर की आह की मिठास न छीनना.... और न ही मेरी बेरुख़ी के दर्द को किसी झूठी मेहरबानी से बदलना। क्योंकि कभी-कभी, जो इग्नोर किया जाता है, उसका दर्द, किसी भी दिखावटी इल्तिफ़ात से कहीं ज़्यादा गहरा होता है।
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