ग़ज़ल
ये हूरयान-ए-फ़रंगी दिल ओ नज़र का हिजाब
ये हूरयान-ए-फ़रंगी दिल ओ नज़र का हिजाब
यह ग़ज़ल एक ऐसी नज़ाकतवर हूरयान (परी) का वर्णन करती है जो अपनी शक्ल और निगाहों पर हिजाब रखती है। वह अपनी सुंदरता और अस्तित्व के ज्वार में चंद्रमा और सितारों की तरह चमकती है, लेकिन वह इतनी व्यापक है कि दुनिया के शोर-शराबे में समा नहीं सकती। अंत में, यह बताती है कि सूफ़ी ने शहर के फ़क़ीह को कैसे बिगाड़ दिया है।
गीत सुनें
1
ये हूरयान-ए-फ़रंगी दिल ओ नज़र का हिजाब
बहिश्त-ए-मग़रबियाँ जल्वा-हा-ए-पा-ब-रिकाब
ये विदेशी हूरों का हिजाब है, जो दिल और नज़र को मोह लेता है, यह पश्चिमी स्वर्ग की चमकती हुई शोभा है।
2
दिल ओ नज़र का सफ़ीना सँभाल कर ले जा
मह ओ सितारा हैं बहर-ए-वजूद में गिर्दाब
दिल और नज़र का जहाज़ संभालकर ले जाओ, क्योंकि वजूद का समंदर चाँद और सितारों के भंवर जैसा है।
3
जहान-ए-सौत-ओ-सदा में समा नहीं सकती
लतीफ़ा-ए-अज़ली है फ़ुग़ान-ए-चंग-ओ-रबाब
सौंदर्य की यह बात ध्वनि और गूँज की दुनिया में समा नहीं सकती; यह चंग और रबाब की अद्भुत मधुरता है।
4
सिखा दिए हैं उसे शेवा-हा-ए-ख़ानक़ही
फ़क़ीह-ए-शहर को सूफ़ी ने कर दिया है ख़राब
उसे खानकाह की शैली सिखा दी है; शहर के फ़क़ीह को सूफ़ी ने ख़राब कर दिया है।
5
वो सज्दा रूह-ए-ज़मीं जिस से काँप जाती थी
उसी को आज तरसते हैं मिम्बर ओ मेहराब
वह ज़मीन का वह कोना जिसे देखकर आत्मा काँप जाती थी, आज मिम्बर और मेहराब भी उसे तरसते हैं।
6
सुनी न मिस्र ओ फ़िलिस्तीं में वो अज़ाँ मैं ने
दिया था जिस ने पहाड़ों को रा'शा-ए-सीमाब
मिस्र और फ़िलिस्तीन में वो अज़ाँ मैं ने दिया था जिसने पहाड़ों को रा'शा-ए-सीमाब।
7
हवा-ए-क़ुर्तबा शायद ये है असर तेरा
मिरी नवा में है सोज़-ओ-सुरूर-ए-अहद-ए-शबाब
शायद यह हवा-ए-क़ुर्तबा का असर है तेरा, मेरी नवा में है सोज़-ओ-सुरूर-ए-अहद-ए-शबाब।
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