वो सज्दा रूह-ए-ज़मीं जिस से काँप जाती थी — अल्लामा इक़बाल

वो सज्दा रूह-ए-ज़मीं जिस से काँप जाती थी उसी को आज तरसते हैं मिम्बर ओ मेहराब

“The patch of earth's soul that used to tremble at his presence, Today, the minbar and the arch yearn for him.”

— अल्लामा इक़बाल

अर्थ

वह ज़मीन का वह कोना जिसे देखकर आत्मा काँप जाती थी, आज मिम्बर और मेहराब भी उसे तरसते हैं।

विस्तार

यह शेर हमें समय के बदलाव और भक्ति की बदलती प्रकृति के बारे में बताता है। जिस 'सज्दे' में कभी ज़मीन भी काँप उठती थी, आज उसे मिम्बर और मेहराब भी याद करते हैं। इसका मतलब है कि सच्ची रूहानी शिद्दत, कोई स्थायी चीज़ नहीं है। वह किसी बड़ी इमारत या संस्था में नहीं बसती। यह शुरुआती, कच्चे, गहरे जुड़ाव के खो जाने का एक विलाप है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठ
हिंदी अर्थ
अंग्रेज़ी अर्थ
हिंदी विस्तार
अंग्रेज़ी विस्तार
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.