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ग़ज़ल

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है

यह ग़ज़ल एक गहरे और दार्शनिक प्रेम की अभिव्यक्ति है, जिसमें वक्ता अपने प्रिय के सम्मुख अपनी आत्मा की पवित्रता और अपनी नज़र की सादगी को व्यक्त करता है। वह बताता है कि प्रेम की इस अवस्था में, न तो दिल पूरी तरह से पीड़ा से मुक्त है और न ही नज़र पूरी तरह से पाक है। यह रचना उस रहस्यमय प्रेम की बात करती है जो साधारण और असाधारण के बीच झूलता है, और जिसमें महबूब का बेबाकपन ही वक्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

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1
दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है
दिल में जलन नहीं है, पर आँखें पवित्र नहीं हैं। फिर भी इसमें आश्चर्य क्या कि तुम बेबाक हो।
2
है ज़ौक़-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिन्हाँ ग़ाफ़िल तू निरा साहिब-ए-इदराक नहीं है
दिव्य प्रकटीकरण का नशा भी इसी धूल में छिपा है; तुम लापरवाह नहीं हो, ऐ ज्ञान के स्वामी।
3
वो आँख कि है सुर्मा-ए-अफ़रंग से रौशन पुरकार ओ सुख़न-साज़ है नमनाक नहीं है
तुम्हारी आँखें विदेशी काजल से चमकीली हैं; / तुम्हारा स्वर एक मधुर संगीत है, फिर भी वह मन को भाता नहीं है।
4
क्या सूफ़ी ओ मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूँ की उन का सर-ए-दामन भी अभी चाक नहीं है
सूफ़ी और मुल्ला को मेरे जुनून का कोई ख़बर नहीं है, उनका तो अपना सर-ए-दामन भी अभी चकला नहीं है।
5
कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मिरी ख़ाक या मैं नहीं या गर्दिश-ए-अफ़्लाक नहीं है
मेरी राख कब तक आकाशीय बंधनों में रहेगी? या यह न तो मैं हूँ और न ही ग्रहों की गति (परिवर्तन)।
6
बिजली हूँ नज़र कोह ओ बयाबाँ पे है मेरी मेरे लिए शायाँ ख़स-ओ-ख़ाशाक नहीं है
मैं बिजली हूँ, मेरी नज़र उस बंजर रेगिस्तान पर है। मेरे लिए कस्तूरी और फूलों के प्रेमी उपयुक्त नहीं हैं।
7
आलम है फ़क़त मोमिन-ए-जाँबाज़ की मीरास मोमिन नहीं जो साहिब-ए-लौलाक नहीं है
यह संसार केवल समर्पित हृदय (मोमिन-ए-जाँबाज़) की विरासत है; यदि कोई समर्पित नहीं है, तो प्रभु का कृपा (साहिब-ए-लौलाक) नहीं है।
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