कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मिरी ख़ाक
या मैं नहीं या गर्दिश-ए-अफ़्लाक नहीं है
“How long shall my ashes remain imprisoned in the heavens, Or is it not I, nor is it the cycle of the spheres?”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
मेरी राख कब तक आकाशीय बंधनों में रहेगी? या यह न तो मैं हूँ और न ही ग्रहों की गति (परिवर्तन)।
विस्तार
यह शेर सिर्फ़ एक कविता नहीं है, यह एक फ़लसफ़ा है! शायर हमें जीवन की नश्वरता और ब्रह्मांड की स्थिरता पर विचार करने को कहते हैं। वह पूछते हैं कि मेरी यादें, मेरी ख़ाक, तारों के बीच कब तक कैद रहेंगी? यह एक गहरा सवाल है जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी वास्तविकता, क्या ये आसमाँ का घूमना भी, सचमुच इतना अटल है?
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