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ग़ज़ल

मिलती है ख़ू-ए-यार से नार इल्तिहाब में

ملتی ہے خُوئے یار سے نار التہاب میں
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 13 shers· radif: में

यह ग़ज़ल प्रेम की विरोधाभासी प्रकृति को दर्शाती है, जहाँ प्रेमी महबूब के स्वभाव से मिले दर्द में भी सुकून पाता है। इसमें विरह की अंतहीन पीड़ा, महबूब के सपने में आने मात्र से उम्र भर जागते रहने की बात और प्रिय के अपेक्षित जवाबों के प्रति मीठी उदासीनता का वर्णन है। कवि लगातार दुख के बावजूद गहन और स्थायी प्रेम को व्यक्त करता है।

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1
मिलती है ख़ू-ए-यार से नार इल्तिहाब में काफ़िर हूँ गर न मिलती हो राहत अज़ाब में
आग अपनी तीव्र ज्वाला में भी प्रिय के स्वभाव से अपना रंग-ढंग पाती है। मैं काफ़िर हो जाऊँगा, यदि मुझे तकलीफ़ में भी राहत न मिले।
2
कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ए-ख़राब में शब-हा-ए-हिज्र को भी रखूँ गर हिसाब में
यह बताना मुश्किल है कि मैं इस बर्बाद दुनिया में कब से हूँ, खासकर अगर जुदाई की रातों को भी हिसाब में रखा जाए।
3
ता फिर न इंतिज़ार में नींद आए उम्र भर आने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में
मेरे ख़्वाब में आने वालों ने आने का वादा किया, ताकि मैं फिर कभी उम्र भर इंतज़ार में सो न सकूँ।
4
क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में
मैं क़ासिद के वापस आने से पहले ही एक और ख़त लिख लेता हूँ, क्योंकि मुझे पहले से ही पता है कि वे जवाब में क्या लिखेंगे।
5
मुझ तक कब उन की बज़्म में आता था दौर-ए-जाम साक़ी ने कुछ मिला न दिया हो शराब में
उनकी महफ़िल में शराब का दौर मुझ तक भला कब आता था? कहीं ऐसा तो नहीं कि साक़ी ने शराब में कुछ मिला दिया हो?
6
जो मुनकिर-ए-वफ़ा हो फ़रेब उस पे क्या चले क्यूँ बद-गुमाँ हूँ दोस्त से दुश्मन के बाब में
जो वफ़ा को नहीं मानता, उस पर क्या फ़रेब काम करेगा? दुश्मन के मामले में मैं अपने दोस्त पर क्यों शक़ करूँ?
7
मैं मुज़्तरिब हूँ वस्ल में ख़ौफ़-ए-रक़ीब से डाला है तुम को वहम ने किस पेच-ओ-ताब में
मैं अपने मिलन में भी प्रतिद्वंद्वी के डर से बेचैन हूँ। तुम्हें इस वहम ने किस बड़ी परेशानी में डाल दिया है?
8
मैं और हज़्ज़-ए-वस्ल ख़ुदा-साज़ बात है जाँ नज़्र देनी भूल गया इज़्तिराब में
कवि मिलन के आनंद को ईश्वर-निर्मित अद्भुत बात मानता है। इस तीव्र उत्तेजना में, वह अपनी जान भेंट करना भूल गया।
9
है तेवरी चढ़ी हुई अंदर नक़ाब के है इक शिकन पड़ी हुई तरफ़-ए-नक़ाब में
नक़ाब के अंदर उसकी तेवरी चढ़ी हुई है। नक़ाब की तरफ़ एक शिकन पड़ी हुई है।
10
लाखों लगाओ एक चुराना निगाह का लाखों बनाव एक बिगड़ना इ'ताब में
एक चुराई हुई निगाह लाखों प्रेम और लगाव पर भारी पड़ती है; एक नाराज़गी भरा बिगड़ना लाखों बनावटों को खराब कर देता है।
11
वो नाला दिल में ख़स के बराबर जगह न पाए जिस नाला से शिगाफ़ पड़े आफ़्ताब में
वह आह, जो सूरज को भी चीर सके, दिल में एक तिनके जितनी भी जगह नहीं पाती है।
12
वो सेहर मुद्दआ-तलबी में न काम आए जिस सेहर से सफ़ीना रवाँ हो सराब में
वह जादू भी, जिससे सराब में जहाज़ चल सके, मेरे उद्देश्य को प्राप्त करने में काम न आया।
13
'ग़ालिब' छुटी शराब पर अब भी कभी कभी पीता हूँ रोज़-ए-अब्र ओ शब-ए-माहताब में
ग़ालिब ने शराब छोड़ दी है, लेकिन अब भी कभी-कभी मैं बादलों वाले दिनों और चांदनी रातों में पीता हूँ।
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