ग़ज़ल
ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के
غیر لیں محفل میں بوسے جام کے
इस ग़ज़ल में शायर ने महबूब की महफ़िल में रक़ीबों की मौजूदगी से उपजी जलन, विरह और गहरी उपेक्षा के दर्द को बयां किया है। साथ ही, अपनी बदहाली के लिए महबूब से शिकवा करने के बजाय इसे तक़दीर और आसमान की सितमगरी मानकर स्वीकार करने का भाव भी झलकता है।
Source: rekhta · HI
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1
ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूँ तिश्ना-लब पैग़ाम के
महफ़िल में ग़ैर तो शराब के जाम को चूम रहे हैं, जबकि हम महबूब के एक पैग़ाम के लिए भी प्यासे तरस रहे हैं।
2
ख़स्तगी का तुम से क्या शिकवा कि ये
हथकण्डे हैं चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम के
मेरी बदहाली और टूटी हुई हालत की तुमसे क्या शिकायत करना, क्योंकि यह सब तो नीले आसमान यानी तक़दीर की चालें और हथकंडे हैं।
3
ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
हम ख़त ज़रूर लिखेंगे भले ही उसमें कहने के लिए कोई बात या मतलब न हो, क्योंकि हम तो सिर्फ़ आपके नाम के ही आशिक़ हैं।
4
रात पी ज़मज़म पे मय और सुब्ह-दम
धोए धब्बे जामा-ए-एहराम के
रात भर ज़मज़म के किनारे शराब पी और सुबह होते ही अपने एहराम (तीर्थ-वस्त्र) से उसके धब्बे धो डाले।
5
दिल को आँखों ने फँसाया क्या मगर
ये भी हल्क़े हैं तुम्हारे दाम के
क्या दिल को तुम्हारी आँखों ने फँसाया है? लेकिन ये आँखें भी तो तुम्हारे ही जाल के फंदे (छल्ले) हैं।
6
शाह के है ग़ुस्ल-ए-सेह्हत की ख़बर
देखिए कब दिन फिरें हम्माम के
बादशाह के बीमारी से ठीक होकर नहाने (ग़ुस्ल-ए-सेहत) की ख़बर आई है; अब देखना है कि हम्माम के अच्छे दिन कब लौटते हैं।
7
इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के
इश्क़ ने मुझे बिल्कुल बेकार कर दिया है ग़ालिब, वर्ना पहले मैं भी एक काम का और उपयोगी इंसान था।
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