ग़ज़ल

रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी

رنج کی جب گفتگو ہونے لگی
दाग़ देहलवी· Ghazal· 8 shers· radif: होने लगी

यह ग़ज़ल प्रेमियों के बीच तल्खी और विवाद के कारण घटती मर्यादा और बढ़ती दूरियों को बयां करती है। शायर ने बड़े मार्मिक ढंग से दर्शाया है कि कैसे रंजिश और कड़वाहट के चलते आपसी शिष्टाचार खत्म होकर सम्मान को ठेस पहुँचाता है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी आप से तुम तुम से तू होने लगी
जब दुख और शिकवे-शिकायतों की बातें होने लगीं, तो लहज़ा आदरसूचक 'आप' से अनौपचारिक 'तुम' और फिर अनादर भरे 'तू' पर उतर आया।
2
चाहिए पैग़ाम-बर दोनों तरफ़ लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी
दोनों तरफ़ संदेश ले जाने वाला संदेशवाहक होना चाहिए; अगर बात सीधे आमने-सामने होने लगे तो फिर उसमें क्या मज़ा रह जाता है।
3
मेरी रुस्वाई की नौबत आ गई उन की शोहरत कू-ब-कू होने लगी
अब मेरी रुसवाई और बदनामी की नौबत आ गई है, जबकि हर गली-मोहल्ले में उनकी शोहरत और चर्चा फैलने लगी है।
4
है तिरी तस्वीर कितनी बे-हिजाब हर किसी के रू-ब-रू होने लगी
तुम्हारी तस्वीर कितनी बेपर्दा हो गई है कि अब वह हर किसी के आमने-सामने आने लगी है।
5
ग़ैर के होते भला ऐ शाम-ए-वस्ल क्यूँ हमारे रू-ब-रू होने लगी
ऐ मिलन की रात, ग़ैर (रक़ीब) की मौजूदगी में भला तू हमारे सामने क्यों आने लगी?
6
ना-उम्मीदी बढ़ गई है इस क़दर आरज़ू की आरज़ू होने लगी
निराशा इस कदर बढ़ चुकी है कि अब दिल में कोई इच्छा होने की ही इच्छा होने लगी है।
7
अब के मिल कर देखिए क्या रंग हो फिर हमारी जुस्तुजू होने लगी
देखना है कि इस बार मिलने पर क्या नतीजा निकलता है, क्योंकि एक बार फिर मेरी तलाश शुरू हो गई है।
8
'दाग़' इतराए हुए फिरते हैं आज शायद उन की आबरू होने लगी
आज 'दाग़' बड़े इतराते हुए घूम रहे हैं, शायद अब उनकी कुछ इज़्ज़त और मान-सम्मान होने लगा है।
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