है तिरी तस्वीर कितनी बे-हिजाब — दाग़ देहलवी

है तिरी तस्वीर कितनी बे-हिजाब हर किसी के रू-ब-रू होने लगी

“How utterly unveiled has your portrait now become, / Coming face-to-face with just about anyone.”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

तुम्हारी तस्वीर कितनी बेपर्दा हो गई है कि अब वह हर किसी के आमने-सामने आने लगी है।

विस्तार

यहाँ शायर की टीस और हल्की सी जलन साफ़ झलकती है, जब वह देखता है कि जिस महबूब का दीदार कभी एक नायाब राज़ था, उसकी तस्वीर अब हर किसी के सामने आम हो गई है। यह सिर्फ़ एक तस्वीर का ज़िक्र नहीं, बल्कि उस दर्द की दास्तान है जहाँ एक बेहद ख़ास और निजी एहसास दुनिया की नज़रों में नुमाइश बन जाता है। अपने महबूब को गै़रों के रूबरू देखना आशिक़ के दिल पर एक मीठी सी चोट कर जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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