ग़ैर के होते भला ऐ शाम-ए-वस्ल — दाग़ देहलवी

ग़ैर के होते भला ऐ शाम-ए-वस्ल क्यूँ हमारे रू-ब-रू होने लगी

“With the rival lingering there, O night of union, why have you come to present yourself before my eyes?”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

ऐ मिलन की रात, ग़ैर (रक़ीब) की मौजूदगी में भला तू हमारे सामने क्यों आने लगी?

विस्तार

शायर यहाँ एक प्यारी सी शिकायत के साथ 'शाम-ए-वस्ल' यानी मिलन की रात से मुख़ातिब है। जिस हसीन घड़ी का इंतज़ार उम्र भर रहता है, वह आ तो गई मगर महफ़िल में रक़ीब (ग़ैर) भी मौजूद है। यह उस लाचारी और तड़प को बयां करता है जब महबूब सामने होकर भी पूरी तरह आपका नहीं हो पाता और मिलन की सारी मिठास कड़वाहट में बदल जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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