रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी — दाग़ देहलवी

रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी आप से तुम तुम से तू होने लगी

“When grievances began to find their voice anew, polite 'You' turned to familiar, and familiar shrank to 'thou'.”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

जब दुख और शिकवे-शिकायतों की बातें होने लगीं, तो लहज़ा आदरसूचक 'आप' से अनौपचारिक 'तुम' और फिर अनादर भरे 'तू' पर उतर आया।

विस्तार

दाग़ देहलवी का यह मशहूर शेर बड़ी सादगी से दिखाता है कि आपसी बहस और नाराज़गी में इंसान की तहज़ीब कैसे बिखर जाती है। जब दिल में दबे गिले-शिकवे जुबां पर आते हैं, तो लहजे का सारा एहतराम मिट जाता है और बात 'आप' से 'तुम' और फिर कड़वे 'तू' पर आ पहुंचती है। यह शेर बड़ी खूबसूरती से इंसानी फितरत को उजागर करता है, जहाँ गुस्सा सारी दूरियों और अदब-ओ-आदाब को तोड़ देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.