ग़ज़ल
दिल-ए-मायूस में वो शोरिशें बरपा नहीं होतीं
دل مایوس میں وہ شورشیں برپا نہیں ہوتیں
यह ग़ज़ल गहरी मायूसी, टूटी हुई उम्मीदों और दिल के ठहराव का मार्मिक चित्रण करती है, जहाँ दर्द इतना गहरा हो चुका है कि अब कोई हलचल भी बाकी नहीं रही। शायर अपनी बेताबी को अपने वजूद का अभिन्न हिस्सा मानते हैं, ठीक वैसे ही जैसे लहरें दरिया से अलग नहीं हो सकतीं।
Source: rekhta · HI
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1
दिल-ए-मायूस में वो शोरिशें बरपा नहीं होतीं
उमीदें इस क़दर टूटीं कि अब पैदा नहीं होतीं
इस निराश दिल में अब वो पुरानी हलचलें पैदा नहीं होतीं। उम्मीदें इस कदर टूट चुकी हैं कि अब दोबारा जन्म ही नहीं लेतीं।
2
मिरी बेताबियाँ भी जुज़्व हैं इक मेरी हस्ती की
ये ज़ाहिर है कि मौजें ख़ारिज अज़ दरिया नहीं होतीं
मेरी बेचैनियाँ भी मेरे अस्तित्व का ही एक हिस्सा हैं, क्योंकि यह स्पष्ट है कि लहरें कभी नदी से अलग नहीं हो सकतीं।
3
वही परियाँ हैं अब भी राजा इन्दर के अखाड़े में
मगर शहज़ादा-ए-गुलफ़ाम पर शैदा नहीं होतीं
राजा इंद्र की सभा में आज भी वही परियाँ मौजूद हैं, लेकिन अब वे शहज़ादा-ए-गुलफ़ाम पर फ़रेफ़्ता या मुग्ध नहीं होतीं।
4
यहाँ की औरतों को इल्म की पर्वा नहीं बे-शक
मगर ये शौहरों से अपने बे-परवा नहीं होतीं
बेशक यहाँ की औरतों को ज्ञान या शिक्षा की कोई परवाह नहीं है, लेकिन वे अपने पतियों के प्रति कभी लापरवाह नहीं होती हैं।
5
तअ'ल्लुक़ दिल का क्या बाक़ी मैं रक्खूँ बज़्म-ए-दुनिया से
वो दिलकश सूरतें अब अंजुमन-आरा नहीं होतीं
मैं इस दुनिया की महफ़िल से अपने दिल का क्या रिश्ता बाक़ी रखूँ, जब वो दिलकश चेहरे अब इस महफ़िल की रौनक ही नहीं बढ़ाते।
6
हुआ हूँ इस क़दर अफ़्सुर्दा रंग-ए-बाग़-ए-हस्ती से
हवाएँ फ़स्ल-ए-गुल की भी नशात-अफ़्ज़ा नहीं होतीं
मैं ज़िंदगी के बाग़ के हालात से इस कदर उदास हो चुका हूँ कि अब बहार के मौसम की हवाएँ भी कोई ख़ुशी नहीं देतीं।
7
क़ज़ा के सामने बे-कार होते हैं हवास 'अकबर'
खुली होती हैं गो आँखें मगर बीना नहीं होतीं
अकबर कहते हैं कि मौत या तक़दीर के सामने इंसान के सारे होश-ओ-हवास बेकार हो जाते हैं; भले ही आँखें खुली रहें, लेकिन वे कुछ भी देख नहीं पातीं।
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