हुआ हूँ इस क़दर अफ़्सुर्दा रंग-ए-बाग़-ए-हस्ती से हवाएँ फ़स्ल-ए-गुल की भी नशात-अफ़्ज़ा नहीं होतीं

“So despondent have I grown with the colors of life's garden / That even the breezes of spring bring no delight.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

मैं ज़िंदगी के बाग़ के हालात से इस कदर उदास हो चुका हूँ कि अब बहार के मौसम की हवाएँ भी कोई ख़ुशी नहीं देतीं।

विस्तार

शायर ज़िंदगी को एक बाग़ के रूप में देखते हैं, जहाँ बहार का मौसम आमतौर पर ख़ुशी और नई उम्मीदें लेकर आता है। मगर दिल का अकेलापन और मायूसी इस हद तक बढ़ चुकी है कि बाहर की कोई भी ख़ूबसूरती अब असर नहीं करती। जब रूह ही उदास हो जाए, तो बसंत की ठंडी हवाएँ और फूलों की महक भी दिल को ख़ुशी नहीं दे पातीं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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