“Before the face of Fate, all senses fail and flee, O Akbar; Though the eyes remain wide open, they have lost the power to see.”
अकबर कहते हैं कि मौत या तक़दीर के सामने इंसान के सारे होश-ओ-हवास बेकार हो जाते हैं; भले ही आँखें खुली रहें, लेकिन वे कुछ भी देख नहीं पातीं।
अकबर इलाहाबादी यहाँ इंसान की उस बेबसी को बयां कर रहे हैं, जो मौत या तक़दीर के फ़ैसले (क़ज़ा) के सामने आकर खड़ी हो जाती है। जब क़िस्मत का वार होता है, तो इंसान की सारी समझ, होश और इंद्रियाँ सुन्न पड़ जाती हैं। आँखें खुली तो रह जाती हैं, लेकिन वे कुछ समझ पाने या बदल पाने की क़ूवत खो चुकी होती हैं—यह शेर इंसान की सीमाओं और कुदरत की लाचारी को बहुत सादगी से दिखाता है।
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