ग़ज़ल

हंगामा गर्म हस्ती-ए-नापायदार का

ہنگامہ گرم ہستی ناپائدار کا

Source: Deewan-e-Zauq (1923) · HI

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
हंगामा गर्म हस्ती-ए-नापायदार का चश्मक है बर्क़ की कि तबस्सुम शरार का
इस नश्वर अस्तित्व का हंगामा तीव्र है; यह मानो बिजली की आँख का इशारा है या चिंगारी की मुस्कान है।
2
मैं जो शहीद हूँ लब-ए-ख़न्दान-ए-यार का क्या क्या चराग़ जलता है मेरे मज़ार का
मैं जो अपने महबूब के मुस्कुराते होंठों पर शहीद हुआ हूँ, तो मेरी क़ब्र पर कैसे-कैसे चराग़ रौशन होते हैं।
3
हो राज़-ए-दिल न यार से पोशीदा यार का पर्दा जो दरमियाँ हो दिल के ग़ुबार का
दिल का राज़ दोस्त से दोस्त के कारण छिपा न रहे, अगर दिल के ग़ुबार का कोई पर्दा उनके बीच हाइल हो जाए।
4
आता है गर तो आओ कि सीने से हलके अब आँखों में आके ठहरा है दम इंतज़ार का
अगर तुम्हें आना ही है तो अब आ जाओ, क्योंकि मेरी इंतज़ार की साँस सीने से निकलकर आँखों में आकर अटक गई है।
5
हो पाक-दामनों को ख़लिश गर है क्या ख़तर खटका नहीं निगाह को मिज़गान के ख़ार का
अगर पाक-दामन लोगों को कोई चुभन महसूस हो तो इसमें क्या ख़तरा है? आँख को पलकों के काँटे से कोई खटका नहीं होता।
6
पूछे है क्या हलावत-ए-तल्ख़ाबा-ए-सरिश्क शर्बत है बाग़-ए-ख़ुल्द-ए-बरीं के अनार का
इन कड़वे-नमकीन आँसुओं की मिठास के बारे में क्या पूछते हो? ये तो सर्वोच्च स्वर्ग के बाग़ के अनार का शर्बत हैं।
7
पहुँचेगा तेरे पास कबूतर से पेशतर मक्तूब-ए-शौक़ उड़ के तिरे बेक़रार का
तुम्हारे पास कबूतर से भी पहले पहुँच जाएगा—उड़ कर आता हुआ तुम्हारे बेक़रार आशिक़ का प्रेम-पत्र।
8
है ऐन-ए-वस्ल में भी मिरी आँख सू-ए-दर चस्का जो पड़ गया है मुझे इंतज़ार का
मिलन के ठीक उसी क्षण में भी मेरी आँख दरवाज़े की ओर लगी रहती है, क्योंकि मुझे इंतज़ार करने की ऐसी लत पड़ गई है।
9
क़ासिद लिखूँ लिफ़ाफ़ा को ख़त-ए-ग़ुबार से ता जाने वो यह ख़त है किसी ख़ाकसार का
ऐ क़ासिद, मैं लिफ़ाफ़े को महीन धूल जैसी लिखावट में लिखूँ, ताकि वह जान ले कि यह ख़त किसी ख़ाकसार (विनम्र) का है।
10
देख अपने दुर-ए-गोश को आरिज़ के मुत्तसिल देखा न हो सितारा जो सुब्ह-ए-बहार का
अपने कान के मोती को गाल के पास लगा हुआ देखो, मानो किसी ने बसंत की सुबह का तारा कभी देखा ही न हो।
11
है दिल की दाँव घात में मिज़गान-ए-चश्म-ए-यार करती है क़स्द टट्टी की ओझल शिकार का
यार की आँखों की पलकें दिल को घात लगाकर ताक रही हैं; वे शिकारी की ओट की तरह छिपकर अपने शिकार पर वार करने की कोशिश करती हैं।
12
बुझने की दिल की आग नहीं ज़ेर-ए-ख़ाक भी होगा दरख़्त गोर पे मेरी चनार का
दिल की आग मिट्टी के नीचे भी नहीं बुझेगी; मेरी क़ब्र पर चनार का पेड़ उगेगा।
13
उस रू-ए-ताबनाक पे हर क़तरा-ए-अरक़ गोया कि एक सितारा है सुब्ह-ए-बहार का
उस चमकते हुए चेहरे पर पसीने की हर बूँद ऐसी लगती है मानो वह बहार की सुबह का कोई सितारा हो।
14
ऐ ज़ौक़ गर हैं होश तो दुनिया से दूर भाग इस मयकदे में काम नहीं होशियार का
ऐ ज़ौक़, अगर तुममें होश है तो इस दुनिया से दूर भाग जाओ, क्योंकि इस मयख़ाने में होशियार आदमी के लिए कोई काम नहीं है।
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