है दिल की दाँव घात में मिज़गान-ए-चश्म-ए-यार — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

है दिल की दाँव घात में मिज़गान-ए-चश्म-ए-यार करती है क़स्द टट्टी की ओझल शिकार का

“The lashes of the beloved's eyes lie in ambush for my heart, Stalking their quarry from behind a hunter's screening blind.”

— शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

अर्थ

यार की आँखों की पलकें दिल को घात लगाकर ताक रही हैं; वे शिकारी की ओट की तरह छिपकर अपने शिकार पर वार करने की कोशिश करती हैं।

विस्तार

इस शेर में शायर महबूब की पलकों को एक छिपे हुए शिकारी की तरह दिखाते हैं। ये लंबी पलकें घात लगाकर बैठी हैं, चुपचाप आशिक़ के दिल को फँसाने का इंतज़ार करती हुईं। जैसे शिकारी पत्तों की ओट, यानी टट्टी के पीछे छिपकर अपने शिकार पर निशाना साधता है, वैसे ही महबूब की आँखें आधी छिपी रहती हैं। उसी ओट से वे दिल पर ठीक निशाना लगाती हैं। यह प्यार की ख़ामोश चोट को एक माहिर शिकार से जोड़ने वाली एक प्यारी और जीवंत तस्वीर है। एक ही नज़र किसी को घायल कर सकती है और बंदी बना सकती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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