ग़ज़ल
ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत
ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत
यह ग़ज़ल जीवन के अनुभवों और प्रेम के दर्द को दर्शाती है। शायर बताता है कि उसने कई घाव झेले और दाग़ भी खाए हैं, लेकिन दिल लगाने के बाद वह बहुत पछताया। यह ग़ज़ल उस स्थिति का वर्णन करती है जहाँ व्यक्ति ने अपनी तरफ से बहुत प्रयास किया, लेकिन परिणाम निराशाजनक रहा।
गीत सुनें
1
ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत
दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत
मैंने घाव सहे और दाग भी खाए बहुत, पर दिल लगा कर तो मैं बहुत पछताया।
2
जब न तब जागह से तुम जाया किए
हम तो अपनी ओर से आए बहुत
जब तुम उस जगह से चली गईं, तो हम बहुत दूर से आए थे।
3
दैर से सू-ए-हरम आया न टुक
हम मिज़ाज अपना इधर लाए बहुत
बहुत समय बाद, मैं पवित्र स्थान की ओर आया, लेकिन मैं अपने मिजाज को यहाँ बहुत अधिक लाया।
4
फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे
पर हमें इन में तुम्हीं भाए बहुत
फूल, गुल, शम्स और क़मर सब मौजूद थे, लेकिन उनमें हमें तुम ही बहुत भाए।
5
गर बुका इस शोर से शब को है तो
रोवेंगे सोने को हम-साए बहुत
अगर शहर का शोर इतना है, तो हम सोने के लिए रोएँगे, क्योंकि हम जैसे बहुत से साये हैं।
6
वो जो निकला सुब्ह जैसे आफ़्ताब
रश्क से गुल फूल मुरझाए बहुत
जो सुबह के समय सूरज की तरह निकला, उससे ईर्ष्या के कारण बहुत सारे फूल मुरझा गए।
7
'मीर' से पूछा जो मैं आशिक़ हो तुम
हो के कुछ चुपके से शरमाए बहुत
जब मैंने 'मीर' से पूछा कि क्या मैं आशिक़ हूँ, तो तुमने बहुत चुपके से शरमाते हुए जवाब दिया।
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