ग़ज़ल
उस का ख़याल चश्म से शब ख़्वाब ले गया
उस का ख़याल चश्म से शब ख़्वाब ले गया
उसका ख़याल आँखों से रात और सपने ले गया। यह ग़ज़ल बताती है कि प्रेम का आकर्षण और यादें कितनी शक्तिशाली होती हैं, जो व्यक्ति को नींद, होश और जीवन की स्थिरता से भी दूर कर देती हैं। यह इश्क़ के मदहोशी भरे सैलाब का वर्णन है।
गीत सुनें
1
उस का ख़याल चश्म से शब ख़्वाब ले गया
क़स्मे कि इश्क़ जी से मिरे ताब ले गया
उसके खयाल ने आँखों से रात और ख्वाब ले गए; क़समें कि इश्क़ ने मेरी जान ले गई।
2
किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक
मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया
किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक, मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया। इसका शाब्दिक अर्थ है कि हे आँखों के आँसुओं के स्रोत, तू अब किन नींदों में सोती है? ये पलकें खोल दे, क्योंकि शहर को एक बाढ़ ने बहा दिया है।
3
आवे जो मस्तबा में तो सुन लो कि राह से
वाइज़ को एक जाम-ए-मय-ए-नाब ले गया
जो भी मस्तबा में आ रहा है, वह सुन लो कि रास्ते से शायर ने एक जाम-ए-मय-ए-नाब ले लिया।
4
ने दिल रहा बजा है न सब्र ओ हवास ओ होश
आया जो सैल-ए-इश्क़ सब अस्बाब ले गया
जब इश्क़ का पहाड़ आता है, तो न दिल बचा है, न वीणा, न सब्र, न हवस, न होश; यह सब कुछ ले जाता है।
5
मेरे हुज़ूर शम्अ ने गिर्या जो सर किया
रोया मैं इस क़दर कि मुझे आब ले गया
मेरे हुज़ूर शम्अ ने गिर्या जो सर किया, इसका अर्थ है कि मेरे मालिक (हुज़ूर) के सामने, उस दीपक (शम्अ) ने जो दुःख के आँसू बहाए, मैं इतना रोया कि उसने मेरा जीवन (आब) ले गया।
6
अहवाल उस शिकार ज़ुबूँ का है जाए रहम
जिस ना-तवाँ को मुफ़्त न क़स्साब ले गया
अहवाल उस शिकारी ज़ुबान का है, जाए रहम, जिसने ना-तवाँ को मुफ़्त न कसाई ले गया।
7
मुँह की झलक से यार के बेहोश हो गए
शब हम को 'मीर' परतव-ए-महताब ले गया
मुँह की झलक से यार के बेहोश हो गए, शब हम को 'मीर' परतव-ए-महताब ले गया। इसका अर्थ है कि तुम्हारे मुख की एक झलक मात्र से मेरे प्रिय बेहोश हो गए, और आज रात, 'मीर' ने मुझे चाँद के परदे में ले गए।
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