किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक — मीर तक़ी मीर
“Oh, you who sleep in these sleeps, O eye of tears, The mascara has opened, and the city has been swept away by a flood.”
अर्थ
किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक, मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया। इसका शाब्दिक अर्थ है कि हे आँखों के आँसुओं के स्रोत, तू अब किन नींदों में सोती है? ये पलकें खोल दे, क्योंकि शहर को एक बाढ़ ने बहा दिया है।
विस्तार
यह शेर महबूब से एक तड़पती गुहार है। शायर उससे पूछ रहे हैं कि वह किन नींदों में सो रही है, क्योंकि दुनिया का सैलाब इतना गहरा है कि उसे जागना होगा। यह सिर्फ़ प्रेम की बात नहीं है, बल्कि जीवन की सच्चाई का एहसास है—कि दर्द और तबाही इतनी बड़ी है कि उससे नज़रें फेरना मुमकिन नहीं।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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