ग़ज़ल

शहर से यार सवार हुआ जो सवाद में ख़ूब ग़ुबार है आज

शहर से यार सवार हुआ जो सवाद में ख़ूब ग़ुबार है आज

यह ग़ज़ल एक ऐसे व्यक्ति के आगमन का वर्णन करती है जो शहर में एक तरह का उत्साह और उथल-पुथल लेकर आया है। उसके व्यवहार और उपस्थिति से वातावरण में एक अजीब सी मस्ती और रौनक आ गई है। यह ग़ज़ल उस नशीले प्रभाव का चित्रण करती है जो उसके सौंदर्य और अंदाज़ से उत्पन्न होता है।

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लिपि व अर्थ
1
शहर से यार सवार हुआ जो सवाद में ख़ूब ग़ुबार है आज दश्ती वहश ओ तैर उस के सर तेज़ी ही में शिकार है आज
शहर से यार सवार हुआ, जिससे माहौल में खूब रौनक है आज; जंगल, जंगली और नदी में आज तेज़ी से शिकार का खेल है।
2
बरफ़रोख़्ता रुख़ है उस का किस ख़ूबी से मस्ती में पी के शराब शगुफ़्ता हुआ है उस नौ-गुल पे बहार है आज
उसका चेहरा बर्फ जैसा निर्मल है, और किस ख़ूबसूरती से वह मस्ती में डूबी है; आज, उस नौजवान लड़की पर बहार आई है, जो शराब पीने से मदहोश हो गई है।
3
उस का बहर-ए-हुस्न सरासर औज ओ मौज ओ तलातुम है शौक़ की अपने निगाह जहाँ तक जावे बोस-ओ-कनार है आज
उसका सौंदर्य सागर है, जिसमें लहरें, ज्वार और भावुकता है। मेरी चाहत की नज़र जहाँ तक जाती है, आज वहाँ कोई किनारा या अंत नहीं है।
4
आँखें उस की लाल हुईं हैं और चले जाते हैं सर रात को दारू पी सोया था उस का सुब्ह ख़ुमार है आज
उसकी आँखें लाल हो गई हैं और वह चला जाता है; रात को शराब पीकर सोया था, और आज सुबह वह नशे में है।
5
घर आए हो फ़क़ीरों के तो आओ बैठो लुत्फ़ करो क्या है जान बिन अपने कने सो इन क़दमों पे निसार है आज
अगर आप फ़कीरों के घर आए हैं, तो आइए और यहाँ आराम कीजिए। आज मेरी जान आपके चरणों में समर्पित है।
6
क्या पूछो हो साँझ तलक पहलू में क्या क्या तड़पा है कल की निस्बत दिल को हमारे बारे कुछ तो क़रार है आज
क्या पूछूँ कि साँझ होने तक पहलू में क्या-क्या तड़पा है। कल की निस्बत दिल को हमारे बारे में कुछ तो क़रार है आज।
7
ख़ूब जो आँखें खोल के देखा शाख़-ए-गुल सा नज़र आया उन रंगों फूलों में मिला कुछ महव-ए-जल्वा-ए-यार है आज
आँखें खोलकर जब देखा तो यह फूल की टहनी सा सुंदर लगा, और आज फूलों के रंगों में प्रियतम के मनमोहक रूप की झलक मिली है।
8
जज़्ब-ए-इश्क़ जिधर चाहे ले जाए है महमिल लैला का यानी हाथ में मजनूँ के नाक़े की उस के महार है आज
प्रेम का जुनून जहाँ चाहे वहाँ ले जाता है, जैसे लैला का महल। आज मजनूँ की चाहत का हाथ उस रहस्य के द्वार पर है।
9
रात का पहना हार जो अब तक दिन को उतारा उन ने नहीं शायद 'मीर' जमाल-ए-गुल भी उस के गले का हार है आज
रात का पहना हार जो अब तक दिन को उतारा उन ने नहीं, शायद 'मीर' जमाल-ए-गुल भी उस के गले का हार है आज। (अर्थ: यह पंक्तियाँ कहती हैं कि रात ने वह हार नहीं उतारा जो दिन ने पहना था; शायद 'मीर' जमाल-ए-गुल भी आज उसके गले का हार है।)
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