ग़ज़ल
ऐ अब्र-ए-तर तू और किसी सम्त को बरस
ऐ अब्र-ए-तर तू और किसी सम्त को बरस
यह ग़ज़ल एक निराशा और अलगाव की भावना व्यक्त करती है, जिसमें कवि ईश्वर से अपील करता है कि वह अपनी कृपा या वर्षा केवल इस भूमि पर बरसाए। यह कविता एक टूटे हुए दिल और खोए हुए प्रेम की पीड़ा को दर्शाती है, जिसमें कवि अपने अकेलेपन और भावनात्मक उथल-पुथल को व्यक्त करता है।
गीत सुनें
1
ऐ अब्र-ए-तर तू और किसी सम्त को बरस
इस मुल्क में हमारी है ये चश्म-ए-तर ही बस
ऐ बादल, तू किसी और जगह पर नहीं बरस, क्योंकि इस देश में केवल हमारा ही ये आँसू का स्रोत बचा है।
2
हिरमाँ तो देख फूल बिखेरे थी कल सबा
इक बर्ग-ए-गुल गिरा न जहाँ था मिरा क़फ़स
हिरमाँ ने तो देखा कि कल की सुबह फूलों से बिखरी थी, और जहाँ मेरा पिंजरा था, वहाँ एक फूल की पत्ती गिरी।
3
मिज़्गाँ भी बह गईं मिरे रोने से चश्म की
सैलाब मौज मारे तो ठहरे है कोई ख़स
मेरे रोने से मेरी भौंहें भी बह गईं, हे आँसुओं के सैलाब, अगर कोई लहर टकराएगी तो कौन रोकेगा?
4
मजनूँ का दिल हूँ महमिल-ए-लैला से हूँ जुदा
तन्हा फिरूँ हूँ दश्त में जूँ नाला-ए-जरस
मैं मजनूँ का दिल हूँ, जो लैला के महफ़िल से अलग हो गया है; मैं एक वीराने में अकेला घूम रहा हूँ, जहाँ कोई नाला या धारा नहीं है।
5
ऐ गिर्या उस के दिल में असर ख़ूब ही किया
रोता हूँ जब मैं सामने उस के तो दे है हँस
ऐ गिर्या, तुमने उसके दिल पर बहुत असर किया, कि जब मैं सामने रोता हूँ, तो वह हँस देती है।
6
उस की ज़बाँ के ओहदे से क्यूँकर निकल सकूँ
कहता हूँ एक मैं तो सुनाता है मुझ को दस
उसकी ज़बान के ओहदे से मैं कैसे निकल सकता हूँ? मैं एक बात कहता हूँ, पर वह मुझे दस बातें सुनाती है।
7
हैराँ हूँ 'मीर' नज़्अ' में अब क्या करूँ भला
अहवाल-ए-दिल बहुत है मुझे फ़ुर्सत इक नफ़स
मैं 'मीर' नज़्अ' में हैरान हूँ कि अब क्या करूँ, क्योंकि मेरे दिल की हालत को समझने के लिए मेरे पास एक पल का भी फुर्सत नहीं है।
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