ग़ज़ल

क्या कहें अपनी उस की शब की बात

क्या कहें अपनी उस की शब की बात

यह ग़ज़ल उस रहस्यमय प्रेम की बात करती है जिसे शब्दों में बयाँ करना असंभव है। शायर कहते हैं कि उस प्रिय की रात की बात क्या कहें, और जो कुछ भी कहा जाए, वह भी अधूरा ही लगेगा। यह ग़ज़ल अंततः इस बात पर जोर देती है कि हर किसी की नज़रों में और बातों में एक गहरा, अनकहा सच छिपा होता है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
क्या कहें अपनी उस की शब की बात कहिए होवे जो कुछ भी ढब की बात
अपनी उस की रात की बात क्या कहें, बस आप कहिए जो दिन की कोई भी बात हो।
2
अब तो चुप लग गई है हैरत से फिर खुलेगी ज़बान जब की बात
अब तो आप हैरत में चुप हो गए हैं; जब सही समय आएगा, तो ज़बान फिर खुल जाएगी।
3
नुक्ता-दानान-ए-रफ़्ता की न कहो बात वो है जो होवे अब की बात
नुक्ता-दानान-ए-रफ़्ता की न कहो, बात वो है जो होवे अब की बात। इसका अर्थ है कि बीती हुई बातों या रहस्यों का ज़िक्र न करें, बल्कि केवल वर्तमान समय की बातों पर ही चर्चा करें।
4
किस का रू-ए-सुख़न नहीं है उधर है नज़र में हमारी सब की बात
ओहे, जिसका सुगंधित वचन नहीं है, उधर, हमारी नज़र में सबकी बात है।
5
ज़ुल्म है क़हर है क़यामत है ग़ुस्से में उस के ज़ेर-ए-लब की बात
क्या यह अत्याचार है, या क्रोध है, या प्रलय? / गुस्से में उसके होंठों से निकले शब्द।
6
कहते हैं आगे था बुतों में रहम है ख़ुदा जानिए ये कब की बात
शायर कहते हैं कि मूर्तियों में पहले भी दया थी; हे ख़ुदा, जान लो कि यह बात बहुत पुरानी है।
7
गो कि आतिश-ज़बाँ थे आगे 'मीर' अब की कहिए गई वो तब की बात
गो, कि आतिश-ज़बाँ थे आगे 'मीर', अब की कहिए गई वो तब की बात। इसका शाब्दिक अर्थ है कि मीर, आपके काव्य में पहले आग जैसी ज़बान (यानी जोश और ऊर्जा) थी, लेकिन अब वे समय बीत गया है।
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