ज़ुल्म है क़हर है क़यामत है — मीर तक़ी मीर

ज़ुल्म है क़हर है क़यामत है ग़ुस्से में उस के ज़ेर-ए-लब की बात

“Is it oppression, or wrath, or the Day of Judgment? / The words from her lips, in a fit of anger.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

क्या यह अत्याचार है, या क्रोध है, या प्रलय? / गुस्से में उसके होंठों से निकले शब्द।

विस्तार

यह शेर किसी महबूब के गुस्से की ताकत को बयां करता है। शायर कहते हैं कि जब वो गुस्से में होती हैं, तो उनके लबों से निकली बात इतनी ज़बरदस्त होती है कि वह ज़ुल्म, क़हर और क़यामत सब लेकर आती है। यह सिर्फ़ एक बात नहीं है, बल्कि एक एहसास है... कि एक छोटी सी नाराज़गी भी कितनी बड़ी तबाही ला सकती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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